We are Mulnivasi


दोस्तों खुद को हरिजन कहना बंद करो.. क्या आपको पता है हरिजन किसे कहते है? आज में आपको बताता हूँ.. हरिजन किसे बुलाते है…
इन तथाकथित ब्राह्मणों के एक और शर्मसार कर देने वाला कारनामा आपके सामने प्रस्तुत है…

ये बात है देव दासी प्रथा की; देवदासी प्रथा ब्राह्मणों के इतिहास का और संस्कृति का एक पुराना और काला अध्याय है, जिसका आज के समय में कोई औचित्य नहीं है. इस प्रथा को ख़त्म Continue reading

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History of Reservation


हमारे मूल निवासी बहुजन समाज अर्थात एससी/ एसटी/ ओबीसी/ आपराधिक जन-जाति के बहुतांश पढे-लिखे विशेषतः अधिक पढे-लिखे लोगों को लगता है कि आरक्षण का मतलब बैसाखी है , भीख है ,लाचारीहै । किन्तु हमारे मूलनिवासी बहुजन समाज के महापुरुषों ने बहुत बड़ा संघर्ष कर आरक्षण अर्थात प्रतिनिधित्व पाया है । यह इतनी आसानी नहीं मिला बल्कि इसके लिए फुले-शाहू-पेरियार-अम्बेडकर को 1848 से1956 तक 108 वर्ष संघर्ष करना पड़ा । आरक्षण मुफ्त में मिलने के कारण हमें इसकी कद्र महसूस नहीं होती ।हवा व सूर्य प्रकाश मुफ्त में मिलता है इसीलिए उनकी कद्र महसूस नहीं होती ।  Continue reading

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True History of India 2


Written By: Akash Suryavanshi

जब यूरेशियन लोग दक्षिण भारत का विशाल समुद्र पार कर के भारत के दक्षिणी राज्यों में पहुंचे तो उन लोगों ये ये धारणा बना ली की धरती पानी के अन्दर स्थित है। क्योकि यूरेशियन हजारों किलो मीटर का सफ़र कर के भारत में आये थे। हजारों किलो मीटर की यात्रा के बीच उनको 2-3 जगह और मिली होगी। जहा पर उस समय कोई जन-जीवन नहीं था। इसी से तीन लोकों की धारणा का उदय हुआ। क्योंकि यह बात आज तक विज्ञान भी प्रमाणित नहीं कर पाया कि कही तथाकथित तीन लोक है। परन्तु अपनी बात को सही सिद्ध Continue reading

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True History of India 1


Written By: Akash Suryavanshi

हिन्दू साहित्य में वेद-पुराणों को भारत का प्रमाणिक इतिहास का दर्जा प्राप्त है। कोई भी देश या कोई भी इतिहास पर शोध करने वाली संस्था इन वेदों-पुराणों को अप्रमाणिक मानती हो लेकिन भारत का हर आदमी वेदों और पुराणों को ही देश का इतिहास समझता है। यह वेद पुराण आर्यों, देवताओ, अनार्यों, राक्षसों या सुर-असुरों के युद्धों के भरे पड़े है। हजारों युद्धों का वर्णन इन वेदों पुराणों में किया गया है। देश का युवा, बुजुर्ग या बच्चे सभी इन वेदों-पुराणों को ही देश का इतिहास मानते है, और वेदों पुराणों में लोगों को अथाह Continue reading

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Shudro Ka Itihas


आज कल हमारे भारत के स्कूलों और कॉलेजों में जो भारत का इतिहास पढाया जाता है, उस इतिहास और वास्तविक इतिहास में बहुत अंतर है । वेदों और पुराणों में जो इतिहास वर्णित है, वो भी मात्र एक कोरा झूठ है । क्या कभी किसी ने सोचा जो भी इतिहास हमारे पुराणों, वेदों और किताबों में वर्णित है उस में कितना झूठ लिखा है । जो कभी घटित ही नहीं हुआ उसे आज भारत का इतिहास बना कर भारत की नयी पीढ़ी को गुमराह किया जा रहा है । पुराणों-वेदों में वर्णित देवता और असुरों का इतिहास? क्या कभी भारत में देवता का हुआ करते थे‌? जो हमेशा असुरों से लड़ते रहते थे. आज वो देवता और असुर कहाँ है? Continue reading

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71 आज़ादी पर भाषण


लेखक: आकाश सूर्यवंशी 

आज स्वतंत्रता दिवस है, पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है लेकिन क्या हम आज सही मायनों में आज़ाद है?

यह हमारी स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा सवाल है, मुझे नहीं लग रहा कि हम आज भी पूर्ण रूप से स्वतंत्र है. देश के नेताओं ने देश में जो माहौल बनाया है वह सही रूप से देश की स्वतंत्रता के सबसे बड़ा मजाक है.

आइये थोडा पीछे चले, 1700 से पहले जब देश पर अंग्रेजों की हुकूमत नहीं थी. ब्रिटेन से लोग इंडिया नहीं आये थे, क्या उस समय यह देश आज़ाद था? मेरे विचार में उस समय भी लोग आज़ाद नहीं थे और आज भी लोग गुलामी का जीवन जी रहे है. लोग उस समय भी जातिवाद और पूंजीवाद की गुलामी से ग्रसित थे और आज भी है. वह समय वो समय था जब हिन्दू धर्म नाम का कोई धर्म नहीं था लेकिन देश के तथाकथित उच्च वर्ण का पुरे देश पर अधिपत्य था. लोग सामाजिक परम्पराओं के आधार पर गुलाम थे. देश का बहुत बड़ा वर्ग अपने मौलिक अधिकारों तक से वंचित था. यहाँ तक वह बहुत बड़ा वर्ग, जिसकी जनसँख्या देश का 85% थी को पानी पीने तक का अधिकार नहीं था, वो अच्छा खाना नहीं खा सकते थे, उनकी माँ बहनों को बेचा या मनोरंजन के सामान जैसे प्रयोग किया जाता था, सम्पति संचित करने का अधिकार नहीं था. उनको जानवरों जैसे बस्तियों से बाहर जीने पर मजबूर किया जाता था.

जब अंग्रेज यहाँ आये तो उन्होंने समाज में समानता और समता स्थापित करने की कोशिशे शुरू कर दी. पुरानी मान्यताओं को जिन्हें देश का धर्म और समाज का आधार कहा जाता था जैसे सती प्रथा, रथ यात्रा, चरक पूजा, काशी करवट, नरमेघ, नरबली, कन्या वध, गंगा प्रवाह, ठगी प्रथा आदि का अंत करना शुरू कर दिया. 1902 में अंग्रेजों ने सेकड़ों कानून बना कर यह अमानवीय प्रथाएं बंद करवाई. जिससे देश के पाखंडी समाजवादियों की पूरी व्यवस्था ख़त्म होने के कगार पर आ गई थी. यह सिलसिला अंग्रेजों ने लगातार बनाये रखा. 1880 से 1947 तक हर साल अमानवीय प्रथा को ख़त्म करने के लिए नए नए कानून बना कर देश में सामाजिक समानता और समता की नीव रखी. ऐसे समय में देश का तथाकथित उच्च वर्ग जिनका वर्चस्व ख़त्म होता जा रहा था ने आज़ादी पाने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया. कारण साफ़ था यह वर्ग अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहता था. इन अमानवीय प्रथाओं के अंत से, उनकी कुछ भी अमानवीय कृत्य करने की प्रवृति पर रोक लगती जा रही थी.

जैसा इस तथाकथित उच्च वर्ग ने चाह वही इस देश में होना शुरू हुआ. 1911 में पहली बार अंग्रेजों ने माना कि अब इंडिया को आज़ाद कर देना चाहिए. लेकिन कैसे और किस तरीके से? 1911 में देश को आरएसएस प्रमुख सावरकार के दो राष्ट्र के सिद्धांत पर तथाकथित उच्च वर्ग ने काम करना शुरू किया. पहली बार देश में हिन्दू धर्म नामक शब्द का प्रयोग किया गया और सदियों से प्रताड़ित और शोषित एससी, एसटी, ओबीसी और आदिवासियों को तथाकथित उच्च वर्ग ने अपने ग्रुप में शामिल कर लिया. अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों और देश के प्रताड़ित लोगों को मिला कर एक ग्रुप बनाया गया. सावरकर के दिए 2 राष्ट्र के सिद्धांत के अनुसार देश के 2 टुकड़े करने पर काम शुरू हो गया. जवाहर लाल, गाँधी आदि ने देश को दो टुकड़ों में बांटने की कवयायत शुरू कर दी. एक तरफ हिन्दू लोग जिन में देश के उच्च वर्ग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों और शुद्र को शामिल किया गया तथा दूसरा टुकड़ा मुस्लिमों के देने की बात होने लगी. मेरे विचार से यही से इंडिया के पतन की शुरूआत होती है. अगर सावरकर दो राष्ट्र का सिद्धांत नहीं देता तो कभी देश के 2 टुकडे नहीं होते. यही वह समय था जब देश के 85% वर्ग को बरगलाने की शुरुआत हो गई थी और तथाकथित उच्च वर्ग इस में सफल भी हुआ. शिक्षा के अभाव में देश का 85% वर्ग इनकी चाल में फंस कर तब भी गुलाम था और आज भी गुलाम है. एक अंग्रेज नाम का विदेशी इंडिया को छोड़ गया लेकिन दुसरे विदेशी ब्राह्मण के हाथों में देश को छोड़ गया. जिसके कारण आज तक देश के एससी, एसटी, ओबीसी और आदिवासियों का शोषण ही हुआ है. तथाकथित उच्च वर्ग विदेशी है इस बारे ज्यादा जानकारी के लिए आप डॉक्टर बमशाद के लिखे शोध पत्र को पढ़ सकते है जिसको 2001 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने भी मान्यता दी थी.

आज हर कोई मानता है कि गाँधी ने देश को आज़ाद किया. लेकिन मेरी समझ में यह भी देश के सबसे बड़े वर्ग के खिलाफ एक सोची समझी चाल है. जबकि गांधी ने अपने पुरे जीवन काल में एक भी ऐसा आन्दोलन नहीं किया जिसमें गाँधी को पूर्ण सफलता मिली हो. गाँधी ने अपने जीवन में तीन आन्दोलन किये और तीनों ही आन्दोलन को बिना पूरा किये वापिस लिया. 1932 में गांधी ने गोलमेज़ कांफ्रेंस में यहाँ तक कहा था कि “अगर शूद्रों को अधिकार मिलते है और देश को आज़ादी तो मुझे ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए.” असल में गाँधी और दुसरे उच्च वर्ग के लोग अपना वर्चस्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. उनको आज़ादी से कुछ भी लेना देना नहीं था. ताकि अंग्रेज देश छोड़ कर वापिस चले जाए और फिर से देश में जाति व्यवस्था और पुरानी पाखंडी धर्म की व्यवस्था को लागू किया जा सके. इस प्रकार हम देखते है कि उच्च वर्ग द्वारा प्रचारित देशभक्तों का देश की आज़ादी में कम और अपना वर्चस्व कायम करने में ज्यादा योगदान रहा है. असल में यह वर्ग चाहता ही नहीं था कि देश का सबसे बड़ा वर्ग आज़ाद हो.

आइये बा बात करते है देश के आज़ादी के आन्दोलन के इतिहास की. आज पूरा देश जानता है कि देश में आज़ादी के आन्दोलन की शुरुआत मंगल पांडे नाम के एक ब्राह्मण ने की थी. लेकीन यह एक बहुत बड़ा झूठ है, असल में देश में आज़ादी के आन्दोलन की शुरूआत मातादीन भंगी ने की थी. आप आज भी सुरक्षित रखे अंग्रेजों के रिकॉर्ड में देख सकते है. 1857 के विद्रोह के खिलाफ अंग्रेजों द्वारा लिखी गई रिपोर्ट में सबसे पहला नाम मातादीन भंगी का था. लेकिन प्रचारित करके यह साबित किया गया कि मंगल पांडे नामक ब्राह्मण ने आज़ादी के आन्दोलन की शुरू आत की थी. जोकी सरासर गलत है.

देश की आज़ादी में सबसे ज्यादा योगदान डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर का था. जिन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत से आन्दोलन किये और सभी आन्दोलन सफल रहे. अम्बेडकर ने अपने समय में देश का सबसे बड़ा आन्दोलन महाड आन्दोलन किया था जिसके कारण देश के 85% लोगों को पानी पीने की आज़ादी मिली थी. दुनिया में शायद ही किसी और देश में आज तक कोई ऐसा आन्दोलन हुआ हो. लेकिन यह देश का दुर्भाग्य है कि इस देश में पीने के पानी को पाने तक के लिए आन्दोलन हुए है.

अंग्रेज चाहते थे कि जब भारत को आज़ाद किया जाए तो यहाँ लोकतान्त्रिक व्यवस्था को लागू किया जाए. उसके लिए 1931 में अम्बेडकर ने व्यस्क मताधिकार पर कानून बना कर देश देश की आज़ादी की ओर पहला कदम लिया था क्योंकि लोकतंत्र स्थापित करने के लिए व्यस्क मताधिकार के लिए कानून बनाना बहुत जरुरी था. उसके बाद अम्बेडकर के पीएचडी करने के लिए लिखे शोध पत्र “प्रॉब्लम ऑफ़ रूपी” पर 1935 में देश के बैंक रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थापना की गई. कोई भी देश जब आज़ाद होता है तो वहां के वित् को संचालित करने के लिए एक राष्ट्रिय बैंक की जरुरत पड़ती है. आज़ादी की लड़ाई में अम्बेडकर का यह एक बहुत बड़ा योगदान था.

अब बात करते है कि अंग्रेज जिन्होंने 1911 में देश को आज़ाद करने की बात कही थी लेकिन 1945 बीत जाने पर भी देश को आज़ाद नहीं कर रहे थे उसका कारण क्या था? तो मैं आप लोगों को बताना चाहूँगा कि उस समय महारानी विक्टोरिया ने देश के लोगों के सामने एक शर्त राखी थी कि भारत के लोग अगर अपने देश का संविधान लिख लेते है तो उनको आज़ाद कर दिया जायेगा. नहीं तो भारत को किसी भी हालत में आजाद नहीं किया जायेगा. 2 साल गांधी और नेहरु ने दुनिया के लगभग सभी देश छान मारे इस तलाश में कि उनको कोई विद्वान मिल जाए जो देश का संविधान लिख सके. लेकिन जब उन्हें कोई नहीं मिला तो उस समय फिर महारानी विक्टोरिया ने गाँधी और नेहरू को सलाह दी कि जब तुम्हारे पास दुनिया के सबसे बुद्धिमान आदमियों में से एक भीम राव अम्बेडकर है तो आप बाहर क्यों किसी और को संविधान लिखने के लिए ढूंढ रहे हो?

मजबूरी में एक बार फिर नेहरू और गाँधी को अम्बेडकर के पास आना पड़ा और उनसे देश का संविधान लिखने का आग्रह किया. 29 अगस्त 1947 को अम्बेडकर को संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया गया और उन्होंने 2 साल 11 महीने और 18 दिन में देश का संविधान लिखा था. जो लोग कहते है कि देश का संविधान अम्बेडकर ने नहीं लिखा है वह लोग एक RTI भरे और पता करे. संविधान बनाते समय बाकि सदस्य क्या कर रहे थे. पता चल जायेगा, आधे विदेशों में ऐश कर रहे थे, कुछ बीमार चल रहे थे. और कुछ लोगों जिनको आज देश में संविधान निर्माता प्रचारिक कर रहे है उन्होंने संविधान समिति में आना भी जरुरी नहीं समझा था.

उसके बाद 1951 में जब देश में तथाकथित उच्च वर्ग महिलाओं को आज़ादी देने के पक्ष में नहीं था और हिन्दू कोड बिल को मान्यता नहीं दे रहा था तो अम्बेडकर ने संसद से इस्तीफा तक दे दिया था. आज भी अम्बेडकर देश की संसद से इस्तीफा देने वाले सबसे पहले और अंतिम सांसद है. अम्बेडकर एक मात्र आदमी हुआ जिसने जिसने देश के साथ साथ महिलाओं की आज़ादी के लिए भी कानून बना कर उनको कानूनी आज़ादी सहित सम्पति का अधिकार भी दिया था. यह बात अलग है कि बाद में इंदिरा गांधी ने हिन्दू कोड बिल को लागू किया था.

इस प्रकार हम देखते है देश को आजाद करवाने में डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर का सबसे ज्यादा योगदान था. 1942 से 1947 तक ना तो किसी ने कोई आन्दोलन किये ना किसी ने अंग्रेजों के खिलाफ कोई हमले किये लेकिन फिर भी देश आज़ाद हुआ. तो यह कहना या मानना गलत है कि देश गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद, सुभाष चन्द्र बोस आदि के कारण हुआ है. असल में इन 5 सालों में अम्बेडकर ने अपनी प्रतिभा के दम पर देश को “आज़ादी की संधि” के आधार पर आज़ाद करवाया था. थोड़े में यह कहा जा सकता है कि देश ना कभी आज़ाद था ना हुआ है. आज फिर देश की स्थिति वही होती जा रही है जो अंग्रेजों के आने से पहले थी. देश में हर 18 मिनट में एक आदमी जाति आधार पर प्रताड़ित होता है और हर 3 मिनट में एक बलात्कार होता है. जिसके लिए सामंती उच्च वर्ग हर तरह से जिमेवार है.

अब बात करते है देश के आज़ाद होने की सचाई पर…. भारत ना कभी आज़ाद हुआ था और ना आज़ाद है. देश की जनता को बेबकुफ़ बनाया जा रहा है. Treaty of Freedom एक्ट के अनुसार देश को महज 99 साल के लिए आज़ाद किया गया है. जिसका समय अभी ख़त्म होने वाला है. और जिन शर्तों पर देश को आज़ादी दी गई थी उनमें से एक भी शर्त पूरी नहीं की गई. तो अंग्रेजों का वापिस आना तय है. अग्रेज जाने से पहले एक बात कह गए थे कि ब्राहमण न्यायवादी और निष्पक्ष नहीं होते. यही बात आज सच हो रही है आज देश में 80% सरकारी नौकरियां ब्राह्मणों के पास है. मतलब ब्राह्मण लगातार देश को अपने कब्जे में करता जा रहा है. देश तब भी गुलाम था, और आज भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था का गुलाम है. आज जरुरत है एक और क्रांति की ताकि देश पूर्ण रूप से ब्राह्मणों से आज़ाद हो सके. आइये, एक हो जाइये.. और हम असली आज़ादी के लिए क्रांति करे…

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भगवान बुद्ध के 2561 वें त्रिविध पावन पर्व 10 मई 2017 पर आप सभी को कोटी मंगलकामनाऐ


buddh

दुल्लभो पुरिसो जञ्ञो सो सब्बत्थ जायति।य

त्थ सो जायति धीरो तं कुलं  सुख मेधति।।

धम्मपद-193

अर्थ: महान परूषों का जन्म दुर्लभ (बहुत मुश्किल) से होता है और उनका जन्म हर स्थान पर नहीं होता। जहां ये महान पुरूष जन्म लेते हैं, वह अपने कुल और रा्ष्ट्र की ख्याति बढाते हैं।
सिद्धार्थ के जीवन के साथ वैशाख पूर्णिमा के दिन तीन प्रमुख घटनाऐं जुड़ी हैं

1: सिद्धार्थ के रुप में उनका जन्म।

2: बुद्धत्व प्राप्ति।

3: महापरिनिर्वाण की प्राप्ति।

संसार में इस प्रकार की तीन पवित्र घटनाऐं किसी भी अन्य महापुरूष के साथ नहीं घटी हैं। इन तीन घटनाओं के कारण आज के दिन को “त्रिविध पावन पर्व” कहते है।

जन्म

उत्तर भारत के हिमालय पर्वत की तराई में शाक्यों का कपिलवस्तु नाम का वैभवशाली नगर था। वर्तमान में यह स्थान पिपरहवा गांव,जनपद सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश के नाम से जाना जाता है। यही सिद्धार्थ की मूल नगरी थी। सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन यहीं पर राज करते थे। महाराजा शुद्धोधन के दो रानियां थी,उनमें से एक का नाम महामाया और दूसरी का प्रजापति गौतमी था। जो दोनों सगी बहन भी थीं। यह दोनों देवदह निवासिनी थीं।
जब महामाया ने गब्ब  धारण किया और उसके प्रसव का समय जैसे ही नजदीक आया तो रानी ने अपने मायके जाने की इच्छा प्रकट की। राजा शुद्धोधन ने अपनी रानी महामाया को उचित व्यवस्था के साथ भेज दिया। कपिल वस्तु से लगभग १० किमी. की दूरी पर शुद्धोधन का लुम्बिनी नामक शालवन का राज उद्धान था। जो वर्तमान नेपाल राज्य में स्थित है। लुम्बिनि को नेपाल में रूम्मिनदेई के नाम से पुकारा जाता है। इसी बाग में मायके जाते समय आराम के लिए रूकी। उसी समय 563 ईसा पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन शालवृक्ष के पेड़ों के नीचे महामाया ने एक बच्चे को जन्म दिया। बौद्ध जगत में यह दिन “बुद्ध पूर्णिमा” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।आज भी इस स्थान को लुम्बिनी देवी ही कहा जाता है, वे पुन: वहां से कपिलवस्तु लौट आयीं। जन्म के पांचवे दिन  उसका नाम सिद्धार्थ रखा गया और उन्हें 32 महापुरूष लक्षणों तथा  80 अनुव्यंजनों से युक्त  होने वाला बताया गया।
सिद्धार्थ के जन्म के सप्ताह बाद ही उसकी मां का शरीरान्त हो गया। उसका पालन-पोषण उनकी मौसी तथा सौतेली मां महाप्रजापति ने किया। बचपन से ही सिद्धार्थ का स्वभाव बुद्धिमानी, शान्त प्रिय, गंभीर और शील सम्पन्न था,जिससे कई  बार एकान्त में बैठकर वह विचार करते थे। शुद्धोधन अपने बेटे सिद्धार्थ के स्वभाव से चिन्तित रहते थे कि कहीं उसके बेटे को वैराग न हो जाए।
सिद्धार्थ का 19 वर्ष की आयु में कोलिय गणराज्य की सुन्दर कन्या यशोधरा के साथ विवाह हो गया। जब सिद्धार्थ को पुत्र लाभ हुआ तो उसने कहा: ‘राहु जाते बन्धनं जातन्ति’। यानि राहु पैदा हुआ, बन्धन पैदा हुआ। शुद्धोधन ने जब सुना कि सिद्धार्थ ने ऐसा कहा,तब उन्होंने कहा-ठीक है मेरे पोते का नाम राहुल ही होगा।
सिद्धार्थ ने जीवन को सांसारिक बंधन में जकड़ा देख कर ग्रह त्याग करने का निश्चिय किया। शाक्यों और कोलियों के मध्य रोहिणी नदी बहती थी। जिसके पानी से दोनों राज्यों की फसल की सिचाई की जाती थी। जब बुद्ध 28 साल के थे दोनों राज्यों के लोगों में रोहिणी नदी के पानी के बटवारे के लिए घमासान युद्ध होने की स्थिति बन गयी थी। शाक्यों को युद्ध करने के लिए मना किया परन्तु वे मानने के लिए तैयार न थे। भारत में जन्मे विश्व के महानतम विद्वान बोधिसत्व बाबा साहेब डा.भीमराव अम्बेडकर के अनुसार पानी के बटवारे के नाम पर होने वाले युद्ध को टालने के लिए गृहत्याग किया। बौद्ध साहित्य में इस घटना को महाभिनिष्क्रमण के नाम से जाना जाता है।सिद्धार्थ ने अपने माता-पिता, पत्नि और सहित अन्य सगे सम्बन्धियों से गृहत्याग की आज्ञा प्राप्त कर ली।

बुद्धत्व लाभ

29 वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ कन्थक घोड़े की पीठ पर बैठ कर अपने दरबारी छन्दक के साथ निकल कर अनोमा नदी के किनारे  पहुंचे। वहां पर अपने केशों को तलवार से कतर दिया और राजशाही वस्त्रों को उतार कर काषाय वस्त्रों को धारण कर लिया।वस्त्र और घोड़े को छन्दक को सौंप वापिस कपिलवस्तु जाने का आदेश दिया।
सिद्धार्थ आचार्य आलाम-कलाम के आश्रम में पहुंच कर  वहां समाधि तत्व को सीखा। वहां से सम्यक सम्बोधि की खोज के लिए विदा हुए। वे दूसरे सुप्रसिद्ध दार्शनिक उद्द्करामपुत्त के आश्रम में पहुंचे। वहां पर नैसंज्ञा-नासंज्ञायतन नामक समाधि की शिक्षा प्राप्त की। सिद्धार्थ ने सम्यक सम्बोधि के लिए अपूर्ण समझ कर आश्रम छोड़ दिया। सिद्धार्थ की ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा को देख कर उन्होंने भी आश्रम छोड़ दिया। वे पांच परिवाजक कोण्डिण्य, वप्प, भद्दिय, महानाम और अश्वजित तभी से सिद्धार्थ की सेवा में इस आश्य के साथ संलंग्न हुए कि सिद्धार्थ को बोधिलाभ होने पर वे सर्वप्रथम उनके ज्ञान का लाभ उठायेंगे।
सिद्धार्थ उरूवेला(बोधगया) के अन्तर्गत आने वाले रमणीक स्थान डुंगेश्वरी पहाड़ पर कठिन साधना करने लगे।इस स्थान पर आहार के नाम पर मात्र एक चावल का दाना ग्रहण किया और साधना करते-2 उनका शरीर सूख कर कांटा हो गया। वे चलने फिरने में भी असमर्थ होने लगे। वहां से कुछ दूर सैनानि नामक ग्राम के निकट फल्गू ( निरंजना) नदी के किनारे के किनारे साधना करने लगे।एक रात्रि स्वप्न में वीणा बजाती तीन युवतियां वीणा को अलग-कसते हुए आवाज सुनकर मध्यम स्थिति में कसने से मधर और सुरीलीन आवाज सुनाई देने पर शरीर को भी उसी स्थिति में उचित मानकर आहार लेने का विचार किया। उन्हीं दिनों सुजाता नाम की कृषक की पुत्री अपनी पुत्र प्राप्ति की मन्नत पूर्ण होने पर वट वृक्ष की पूजा-अर्चना करने वहां आयी।  पूजा के बाद सुजाता ने उसी वट वृक्ष के नीचे बैठे सिद्धार्थ को खीर ग्रहण करने की विनति की। सिद्धार्थ ने खीर को ग्रहण कर लिया। सुजाता द्वारा दी खीर को खाने पर  पांच परिवाजक सिद्धार्थ को पथ भ्रष्ट कहकर उन्हें अकेला छोड़ कर चले गये।

सिद्धार्थ को नदी पार करने से पूर्व स्वास्तिक नामक किसान मिला। उसने सिद्धार्थ के मन्तव्यको जानकर आठ मुट्ठी कुश नाम की घास दी। नदी पार कर सिद्धार्थ ने कुश का आसन बनाया। उस आसन को वज्रासन को ही कहा जाता है।  पीपल के पेड़ के नीचे  उस आसन पर साधना करने बैठ गये।उन्होंने अधिष्ठान किया कि “चाहें मेरी त्वचा,नसें और हड्डियां ही बाकी रह जायें,चाहे मेरा सारा मांस और रक्त शरीर से सूख जाये किन्तु बिना बोधि प्राप्त किये मै इस आसन का परित्याग नहीं करूंगा।”सिद्धार्थ को वैशाख पूर्णिमा की चांदनी रात को बोधि लाभ प्राप्त किया। उस समय उनकी आयु 35 वर्ष थी। वह तभी से बुद्ध कहलाने लगे,जो संसार में प्रसिद्ध हुए। इस पीपल के पेड़ को बोधि वृक्ष कहा जाने लगा।इस दिन वैशाख पूर्णिमा को ही तभी से बुद्ध पूर्णिमा कहा जाने लगा।

चार आर्यसत्य
भगवान ने मानव कल्याण के लिए चार आर्य सत्य बड़े अनुसंधान के बाद कहीं।आर्य का मतलब उत्तम (श्रेष्ठ) है,सतपुरूष,साधु, ज्ञानी,बुद्धिमान लोग।चार आर्य सत्य मनुष्य के जीवन जगत की ठोस सच्चाई है।
1: दु:ख आर्य  सत्य:
“भिक्खुओ!मैं तुम्हें दो ही बातें सिखाता हूं,

दु:ख और दु:ख से मुक्ति।” प्रश्न उठता है, क्या होना दु:ख है?

इसके उत्तर में भगवान बुद्ध ने कहा-पैदा होना है,शोक करना दु:ख है,रोना-पीटना दु:ख है,पीड़ित होना

दु:ख है,इच्छा की पूर्ति न होना दु:ख है। अर्थात पांच उपादान स्कन्द ही दु:ख हैं-रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान।

2:दु:ख समुदय आर्य सत्य:

जीवन में दुख है, उसका कोई न कोई कारण अवश्य है। वह है,काम,भव,विभव,इन्द्रिय सुख आदि की तृष्णा ही दु:ख समुदय है।

3: दु:ख निरोध आर्य सत्य:

संसार में दु:ख है।

दु:ख का कारण है।वह है तृष्णामयी होना।जब तृष्णा का निरोध होता है,तो इस सच्चाई को दु:ख निरोध आर्य सत्य कहते हैं। दुख के कारण के निवारण से निर्वाण सुख प्राप्त होता है।

4:दु:ख निरोध गामिनी प्रतिपदा आर्य सत्य:

कुछ लोग खाओ पिओ मौज करो या शरीर को कष्ट देने वाली तपसाधना को ही दु:ख निरोध की संज्ञा देते हैं। जबकि भगवान ने दोनों प्रकार की अतियों से बचकर मध्यम मार्ग का ज्ञान प्रशस्त करके सभी दु:खों से मुक्ति पाया सकता है। यही मार्ग आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जो दु:ख निरोध की ओर ले जाता है।जो इस प्रकार है-
आर्य अष्टांगिक मार्ग:

आर्य अष्टांगिक मार्ग भगवान बुद्ध की अद्भुत खोज थी।वर्तमान जीवन में सुख-शांति प्राप्त करने के लिए भगवान ने आर्य अष्टांगिक मार्ग बताया है। जिसके आठ अंग हैं, जो इस प्रकार हैं-

1:सम्यक दृष्टि:

सम्यक दृष्टि अर्थात सम्यक दर्शन, दर्शन शब्द का वास्तविक अर्थ है जो वस्तु जैसी है उसे वैसे ही उसके गुण-धर्म-स्वभाव में देखनाअर्थात अनुभव से जानना।इसका अनुभव विपश्यना साधना द्वारा किया जा सकता है।सभी संस्कार अनित्य हैं, सभी संस्कार दु:ख हैं, सभी धर्म अध्यात्म हैं का बोध होना सम्यक दृष्टि है।

2: सम्यक वाणी:

हमारी वाणी सम्यक हो अर्थात  झूठ, कड़वी, चुगली,निन्दा,गाली आदि नामों बोलें।संयमित वाणी बोलें जो दो पक्षों को जोड़ने कारण काम करें। ऐसी वाणी को सम्यक वाणी कहते हैं।

3:सम्यक कर्म:

मन,वचन और शरीर से सभी कार्य सम्यक हो अर्थात अनैतिक कर्मों से दूर रहना। जीवन हिंसा चोरी तथा मिथ्याचार रहित कर्म करना ही सम्यक कर्म है।

4: सम्यक आजीविका:

परिवार के भरण पोषण के लिए कियेे जाने काला कर्म आजीविका कहलाता है।यदि यह कर्म चोरी, जारी, हिंसा और अन्याय एवं अपराध मुक्त है तो इसे सम्यक आजीविका कहते हैं।

5:सम्यक व्यायाम:

सम्यक व्यायाम कार्यक्रम उद्देश्म है इन्द्रियों पर संयम रखना। बुरी भावनाओं को रोकना,अच्छी भावनाओं को उत्पन्न करने कारण प्रयत्न करना तथा अच्छी भावनाओं को कायम रखना।

6:सम्यक स्मृति:

सम्यक स्मृति का अर्थ है मन की सत्य जागरूकता के द्वारा मन में उत्पन्न अकुशल विचारों का सदैव स्मरण रखना। शरीर और चित्त में स्वभावत  तौर होने वाली क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के प्रति सचेत रहना और वास्तविक सच्चाई को समता भाव से देखना-परखना यही सम्यक स्मृति है।

7:सम्यक समाधि:

अपने आप में सतत जागरूक रहते हुए मन को एकाग्र करना और प्रत्येक लक्षण सच्चाई को जानते हुए द्वेष, मोहरहित रहना ही सम्यक समाधि है।

8:सम्यक संकल्प:

दूषित विचारों से रहित, रागरहित,द्वेषरहित वह मोह रहित चिंतन मनन ही सम्यक संकल्प है।
ज्ञान प्राप्ति के बाद वे बोधिवृक्ष के आसपास सात सप्ताह लगातार सात वृक्षों के नीचे एक-२ सप्ताह विचरते रहे।इन्हीं दिनों तपस्सुऔर मल्लिक नाम के दो व्यापारियों ने बुद्ध को खाने के लिए मधुपिण्डक(गुड़ और मट्ठा) दिया। वे दोनों बुद्ध और धम्म की शरण में जाने वाले पहले उपासक बने।
इस ज्ञान का उपदेश देने सर्वप्रथम जब वे सारनाथ जा रहे थे, तो रास्ते में उन्हें उपक नाम का आजीवक मिला , उसकी शंकासमाधान करते हुए और उसे अपने को बुद्ध होने की बात कहकर ऋषिपत्तन सारनाथ पहुंचे।
वहां पर पांच परिवाजक कोण्डिण्य,वप्प,भद्दिय,महानाम और अश्वजित को प्रथम उपदेश दिया। जिसे धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त के नाम से जाना जाता है। वर्षावास आरम्भ होने पर बुद्ध प्रथम वर्षावास ऋषिपत्तन में किया।
उन दिनों काशी श्रेष्ठी कुलपुत्र यश ग्रहस्थ जीवन से परेशान होकर शान्ति की खोज में ऋषिपत्तन जा पहुंचा।भगवान बुद्ध जहां विचरण कर रहे थे वहां जा पहुंचा।बुद्ध ने अपने उपदेश से उसे शान्त किया। यश भी बुद्ध की शरण में जाकर भिक्खु बना।
काशी श्रेष्ठी अपने पुत्र के जूतों के निशान देखते-२ ऋषिपत्तन जा पहुंचा। ग्रहपति ने बुद्ध से अपने पुत्र के होने के सम्बन्ध में पूछा। बुद्ध का उपदेश सुनने पर उसकी धम्म दृष्टि जाग गयी।  तव उसने शरणागत उपासक होने की विनति करते हुए कहा, “मैं बुद्ध, धम्म और संघ की शरण जाता हूं।यश के पिताजी को संसार में तीन वचनों उपासक होने कारण गौरव प्राप्त हुआ। यश के पिता ने आज का  भोजन करने की आज्ञा मांगी, जिसे बुद्ध ने मौन रहकर स्वीकार किया। श्रेष्ठी अभिवादन कर अपने घर चला गया।

बुद्ध अपने साथ यश को लेकर श्रेष्ठी के घर पहुंचे। दोनों का भोजन होने पर बुद्ध ने परिवार की मंगल कामना करने के लिए पुण्यानुमोदन किया। यश की माता और पहली पत्नि को भी धम्म दृष्टि उत्पन्न हुई। दोनों ने आज से सांजलि उपासिकाऐं होने की विनति की।लोक में वही तीन वचनों वाली प्रथम उपासिकाऐं हुई।
महापरिनिर्वाण
भगवान बुद्ध ने अपने परिनिर्वाण की घोषणा तीन महा पूर्व वैशाली में की थी कि आज से ठीक तीन माह बाद मेरा परिनिर्वाण कुशीनगर में होगा। घोषणा के अनुरूप बुद्ध ने कुशीनगर के लिए प्रस्थान किया।वे विभिन्न गांव में अपना उपदेश करते हुए पावा में चुन्न के आम्र वन में पहुंचे।चुन्न तथागत के सम्मानार्थ उनके पास पहुंचा और अभिवादन करके एक ओर बैठ गया।चुन्न ने तथागत को अगले दिन के लिए भोजन का निमंत्रण किया,जिसको बुद्ध ने स्वीकार कर लिया। चुन्न पुन:अभिवादन करके घर लौट आया।
दूसरे दिन तथागत संघ के साथ चुन्न के घर पहुंचे।चुन्न ने भिक्खु संघ को अलग -2 आसनों पर बैठाया। चुन्न ने अनेक व्यंजनों के साथ शूकरमद्दव (जिमीकन्द) के साथ सभी को भोजन परोसा। भोजन ग्रहण करने के बाद अपना प्रवचन कर आगे चल दिए। चुन्न के घर का भोजन करने पर तथागत के खूनी दस्त ( पेचिस) लग गये। कुछ दूर यात्रा करने के बाद वे रास्ते से हटकर एक वृक्ष के नीचे आनन्द से चीवर बिछवा कर लेट गये। भगवान को उस समय आराम की शख्त जरूरत हुई। बुद्ध उस जगह आराम करने लगे। विभिन्न स्थानों पर होते हुए रास्ते में एक आम्र वन पड़ा, जिसमें संघाटी बिछवा कर उस पर तथागत लेट गये।

तथागत ने आनन्द से कहा कि चुन्न को चिन्ता से मुक्त करना कि उसके यहां भोजन करने से मैं बीमार हुआ हूं, इसलिए उसके मन में किसी भी प्रकार का अपराध का बोध नहीं होना चाहिए।तथागत ने अपने जीवन के दो महत्वपूर्ण भोजनों के सम्बन्ध में कहा – “मेरे जीवन में दो दो भोजन विशेष महत्व रखते हैं। सुजाता के भोजन के बाद मुझे सम्यक बोधि प्राप्त हुई और चुन्न के भोजन के बाद परिनिर्वाण प्राप्त करूंगा।”

“हिरण्यवती नदी पार करके बुद्ध ने कुशीनगर में मल्लों के शाल वन में दो शाल वृक्षों के नीचे आनन्द से संघाटी बिछाने को कहा, जहां उनका परिनिर्वाण होना था। बुद्ध उत्तर की तरफ सिर और दक्षिण की तरफ पैर करके, पैर के ऊपर पैर रखकर दांई करवट से आराम करने लगे। तथागत ने कुछ समय पश्चात कहा, ‘सब्बे संखारा अनिच्चा’ अर्थात जितने भी संसकार हैं सब अनित्य हैं। भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण का समय नजदीक आने पर आनन्द आसुओं से रोने लगे। तथागत ने आनन्द को समझाते  हुए कहा- शोक मत करो। प्रिय से वियोग संभव है,जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु न हो,यह असम्भव है। तथागत ने आज रात होने वाले परिनिर्वाण की जानकारी के लिए मल्लो
के सभागार में आनन्द को भेजा,उस समय मल्लों की सभा हो रही थी। तथागत के होने वाले परिनिर्वाण की जानकारी सुनकर सभी उदास होकर तथागत के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। प्रथम पहर तक दर्शन करके सभी मल्ल वापिस अपने-2 घर चले गये।
उनके बाद कुशीनगर से सुभद्र परिव्राजक बुद्ध से अपनी शंका समाधान के लिए आया। उसको आनन्द ने तथागत से मिलने से रोक दिया,कि तथागत को अंतिम समय में कष्ट पहुंचाना अच्छा नहीं। बुद्ध ने उनकी वार्तालाप सुनकर सुभद्र को अपने पास भेजने का आदेश दिया।सुभद्र ने सर्वप्रथम तथागत की वंदना करके अपनी शंकाओं को उनके समझ रखा,जिनका समाधान बुद्ध ने कियाऔर सुभद्र भी सन्तुष्ट हुआ। सुभद्र बौद्ध धम्म में प्रव्रजित हुआ और इस प्रकार उसने भगवान के जीवन काल में अन्तिम भिक्खु होने का गौरव प्राप्त किया। बुद्ध के परिनिर्वाण की वजय से  आस-पास के भिक्खु उनके पास एकत्रित हो गये। तथागत ने उपस्थित भिक्खुओं को कहा- “मेरे पश्चात तुम्हारा कोई भी शास्ता नहीं होगा,मेरा उपदेश ही तुम्हारा शास्ता होगा।”
तथागत ने भिक्खुओं के सम्बोधन के सम्बन्ध में आनन्द की तरफ संकेत करते हुए कहा- “आनन्द! एक दूसरे को आवुस कहकर सम्बोधन करते हैं, मेरे पश्चात वे ऐसा नहीं करें पुराने भिक्खु नये भिक्खुको नाम से, गोत्र से अथवा आवुस(आयुष्मान) कहकर कहकर सम्बोधन किया करें,और नये भिक्खु अपने से पुराने (सिनियर) भिक्खु को भन्ते कहकर सम्बोधन करें।”
तथागत ने अपने अन्तिम संदेश में भिक्खुओं के जीवन यापन के सम्बन्ध में कहा, ‘अप्पमादेन सम्पादेथ’ “सभी वस्तुओं का क्षय अवश्यम्भावी है। अत:जीवन के लिए अप्रमाद सहित प्रयास करो।” इतना कहकर उन्होंने 80 वर्ष की आयु पूर्ण कर वैशाख पूर्णिमा की रात को महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।

सबका मंगल हो

 

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तर्क ही ज्ञान की चाबी है !


images (9)जो लोग ये कहते हैं ईश्वर तर्क के परे हैं वो लोग बड़े ही धूर्त है | विश्व में कोई भी चीज तर्क के परे नहीं हो सकती | ऐसा कहकर वो लोग अपनी सड़ी गली दकियानूसी और मूर्खतापूर्ण बातों को सही ठहराना चाहते हैं और उन पर पर्दा डालना चाहते हैं |
ऐसे लोगो को भय होता है अगर लोग सोचने लगे तो हमारी दुकानदारी कैसे चलेगी |
ऐसे लोगो को भय होता है अगर लोग तर्क करने लगें तो हमारी बकवासो को कौन सुनेगा |
ऐसे लोगो को भय होता है अगर लोग तर्क करने लगे तो हमारा पेट कैसे पलेगा |
ऐसे लोगो को भय होता है कि अगर लोग तर्क करने लगे तो हमारा सदियों से चला आ रहा शासन कैसे बचेगा |
ऐसे लोगो का हरसंभव प्रयास होता है कि लोग मूर्ख ही बने रहें ताकि उनका और उनकी पीढियों का भविष्य सुरक्षित रह सके |
ऐसे लोग इस तरह की बात करके अपने लिए सामाजिक सुरक्षा चाहते हैं ताकि कभी उन पर कोई सामूहिक संकट आये तो ऐसे मूर्ख लोगो का समूह ईश्वर के नाम पर उनके लिए ढाल का काम कर सके और अगर जन धन की हानि हो तो उसको ये मूर्ख लोग झेले और वो सुरक्षित रहकर अपना व्यापार चलाते रहें | इसलिए ऐसे धोखेबाज लोगो से बचे और हर चीज पर तर्क करना सीखें |
तर्क ही वो चाबी हैं जो सत्य और असत्य का ताला खोलती है |
तर्क से ही अज्ञानता का अँधेरा ख़त्म होता है और ज्ञान का सवेरा होता है |


– संजय पटेल

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भारत को इच्छाधारी लिंग परिवर्तन का वरदान मिला है क्या ? : संजय पटेल


भरत इस देश का राजा था ।
 
उसके नाम पर से ही इस देश का नाम भारत पड़ा है, ऐसा माना जाता है आप मेरी इस बात से तो सहमत होंगे।
 
भारत -पाकिस्तान कि दुश्मनी के वक्त भारत ‘बाप’ हो जाता है और भारत -बांगलादेश दुश्मनी के वक्त “दादा”। मगर देशभक्ती के वक्त भारत हो जाता है “माता”.. 
 भारत को इच्छाधारी “लिंग परिवर्तन” का वरदान मिला है क्या ?  व्याकरण के दृष्टी से यह शब्द “भारत” पुल्लिंग है , स्त्रीलिंगी नही । तो हमें विशुद्ध रुप से ‘भारत पिता की जय’ बोलना चाहिए। 
भारत एक पुरुषवाचक नाम है और हम जय भारत गर्व से बोल सकते है।
वैसे देश के साथ वफादरी करनी चाहिए… रिश्तेदारी नहीं !!!
 सवाल यह है की ये माता कैसे बन गई ?
यह धर्म के ठेकेदार और अभी अभी जो पेंट पहनना शिखे है वो सब ने पिता को माता बना दिया और लोगो के पास भारत माता की जय बुला रहे है।
मगर संघीओ कान खोल के सुन लो तुम जो तुम्हारी भगवे झंडेवाली भारतमाता की जय बुलाना चाहते हो तो वो तो हम कतई नहीं बोलेंगे।
पहले तुम्हारी माँ के हाथ में राष्ट्रध्वज दिलाओ फिर राष्ट्र भक्ति की बात करना। यह भारत देश है यह India है, तुम्हारा हिन्दुस्तान नहीं है तो तुम जो मन चाहे वो हम बोले। 5000 सालो से हमसे बोलने का अधिकार भी छीन लिया था और आज जय बुलवाना है ?
 
भारत के संविधान के पहले आर्टिकल में ही इस देश का नाम साफ़ साफ़ लिखा है की, “India that is Bharat” तो फिर ये हिन्दुस्तान कहा से आ गया ? अरे कोई आम आदमी ऐसा बोले तो ठीक है मगर देश के PM भी इस देश को हिंदुस्तान बोल के इस देश का अपमान कर रहे है।
अगर इनकी नहीं मानोगे तो आपको देशद्रोही बना देंगे।
वो तो ठीक मगर वो लोग तो इस देश का नाम भी बदल देते है तो भी इनपे कोई कार्यवाही नहीं होती।
 
 खैर वो तो बोलेगे ही क्योंकि चड्डी पहनकर सिर्फ यही तो शिखा है शायद अब पेंट पहनकर थोड़ी सी बुद्धि आये ।
 
आज तक आपने दुनिया के किसी भी देश के आगे पीछे माता या पिता लगे हुआ सुना है ? अगर सुना हो तो जरा हमें भी बताइएगा।
 
हम देश को पिता या माता तो नहीं कह शकते मगर भाई हम गर्व से जय भारत जरूर कहेंगे।
 
भारत मेरा देश है और में भारत का रहवासी हु।
में भारतीय हु इस बात का मुझे गर्व है क्योकि में यहाँ का मूलनिवासी हु।
 
हा हम जय बोलेंगे मेरे इश देश की जहा का में मूलनिवासी हु।
 
हम गर्व से कहेंगे 
जय भारत
क्योंकि में पहले भी भारतीय हु और अंततः भी भारतीय…
 
– संजय पटेल
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ईश्वर बड़ा या विज्ञान ???


आज कल बहुत सी जगहों पे लिखा होता है,
“आप कैमरे की नज़र में है”

यह पढते ही व्यक्ति होशियार  हो जाता है, और ग़लत काम करने से परहेज़ करता है, जबकि यह  इंसान द्वारा बनाया एक उपकरण  है !

आस्तिक  कहते  है कि हम हर समय ईश्वर की नज़र में हैं, और वहाँ की नज़र न ख़राब होती है, न बंद होती है, न किसी के नियंत्रण मे होती है, यानी बचने का कोई तरीका नहीं है।

  फ़िर भी  लोग CCTV से ज्यादा डरते है और ईश्वरीय कैमरे से बिलकुल डरते नहीं , क्योंकि इंसान सच्चाई जान चुका है कि  ऐसी कोई शक्ति का वास्तव में अस्तित्व ही नहीं है, लेकिन CCTV  किसी को छोडेगा  नहीं ! 
सोचनेवाली  व (हंसनेवाली ) भी बात तो ये है की धार्मिक स्थलों पे भी CCTV लगाया होता है !

ध्यान रहे आप हमेशा CCTV  की नज़र में है ।। 

 जय विज्ञान

– संजय पटेल

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भगवान सिर्फ एक अंधविश्वास !!!


d4hbsलोग कहते हैं कि कण कण मे भगवान है..  अगर कण कण मे भगवान है तो कण कण मे भ्रष्टाचार क्यों है ? अगर जर्रे जर्रे मे भगवान है और बगैर भगवान की मर्जी के पत्ता भी नही हिलता, तो क्या भगवान ही कत्ले आम करवाता है ? जब सब कुछ भगवान की मर्जी से होता है तो भगवान बलात्कार भी करवाता होगा ? डकैती भी डलवाता होगा ?अगर यह सब भगवान ही करवाता है तो,
कितना निर्दयी है भगवान !
 लोग कहते हैं कि भगवान गरीबो, मजलूमों, असहायों की रक्षा करता है। तो भारत की आधे से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए मजबूर क्यों है ? भगवान क्यों नही इन्हें अमीर बना देता? दुनिया मे हर कहीं असहाय, मजलूम ही प्रताडित हो रहा है, भगवान क्यों नही इनकी मदद करता ?
 
लोग कहते है कि भगवान दुष्ट, चोर,गुण्डो को सजा देता है। तो फिर जगह जगह चोरी डकैती, गुण्डागर्दी क्यों हो रही है ? अगर भगवान इनको रोकने मे सक्षम है तो पुलिस ,सेना, कोर्ट कचहरी क्यों है ?
 
सच यह है कि भगवान कुछ नही कर सकता। आज तो भगवान की खुद शामत आ गयी है।
 
आंतकवादी मंदिर, मस्जिद,चर्च देखकर ब्लास्ट कर रहा है.. भगवान अपनी बचत नही कर पा रहा है। भगवान की अष्टधातु मूर्तियों को चोर चुरा कर अंतर्राष्ट्रीय बाजार मे बेंच कर करोडो कमा रहा है, भगवान अपनी रक्षा नही कर पा रहा है। कितना बेबस है भगवान!
 
लोग कहते है कि भगवान दूसरो को पवित्र बनाता है, अपने दर्शन से। लेकिन यह भगवान दलितों के छूने से ही छुईमुई के पौधे की तरह खुद सिकुड जाता है । दलित के छूने से अपवित्र हो जाता है । और फिर गाय, भैंस, बकरी की पाखाना, पिसाब से पवित्र हो जाता है। कैसा भगवान है!
 
भगवान जब सबसे ताकतवर है तो उसकी सिक्युरिटी मे पुलिस , कमाण्डों , सेना क्यों लगायी जाती है ? किसी भी धार्मिक स्थल पर जाइए, वहां गेट पर सबसे ज्यादा लूले, लंगडे, अपाहिज, कोढी लाइन लगाये रहते है.. अंधे को आंख देत ,कोढिन को काया वाला भगवान कहां रहता है, क्यों नही इनकी समस्या दूर कर देता है ?
 
किसी ने कहा है कि “इंसान को बनाकर भगवान ने सबसे बडी गलती की या भगवान को बनाकर इंसान ने।” उत्तर साफ है कि “भगवान को बनाकर इंसान ने सबसे बडी गलती की।” अगर इंसान ने भगवान की कल्पना नही की होती तो इसके नाम पर इतना ज्यादा लुटता, पिटता नही ।
 
– संजय पटेल
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