जातिप्रथा और समाधान


Written by: Akash Suryavanshi

भारत सहित पुरे विश्व में धर्म का आविष्कार मानव के हाथों मानव के शोषण के लिए हुआ है. विश्व के लगभग सभी विकसित देशों में लोगों ने धर्म की इस कड़वी सचाई को समझा और स्वतंत्र धर्म को मानवता के लिए घातक मान कर धर्म को क़ानून द्वारा परिभाषित करके एक सीमित क्षेत्र में बाँध कर दिया है और लोग धर्म को छोड़ कर मानव-विकास के लिए कार्य कर रहे है. लेकिन भारत में आज भी धर्म की स्थिति कानून से ऊपर मानी जाती है. जिसके लिए प्रत्यक्ष रूप से धर्माधिकारी और धर्म के रक्षक जिमेवार है. आज भी भारत के लोग धर्म को लेकर दूसरी सदी के आदिवासियों की तरह आपस में लड़ते झगडते रहते है. यही वो मुख्य कारण है जो भारत के विकास में बाधक है. भारत में धर्म का मुख्य आधार जाति प्रथा है. जो वर्ण और श्रम पर आधारित बताई जाती है लेकिन सचाई कुछ और ही है. भारत में आज भी ब्राह्मण के घर ब्राह्मण, क्षत्रिय के घरक्षत्रिय, वैश्य के घर वैश्य और शूद्रों के घर पैदा होने वाला शुद्र कहलाता है. भारत के समाज में उपरोक्त चार ही वर्ण होते तो भी शायद बात न्याय संगत होती, लेकिन यहाँ स्थिति और भी विकट है. ब्राह्मण सिर्फ ब्राह्मण है, क्षत्रिय सिर्फक्षत्रिय है, वैश्य भी हर हाल मेंवैश्य है लेकिन शूद्रों को यहाँ 6743 जातियों में बाँट दिया गया है. अर्थात शूद्रों के घर में जो भी बालक या बालिका उत्पन होते है वह जन्म से ही 6743 जातियों का हिस्सा बन जाते है.

caste system and its solutionउपरोक्त सभी बातों से यह साबित हो जाता है कि भारत में जातिप्रथा श्रम या वर्ण पर नहीं जन्म पर आधारित है.भारत में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जातिप्रथा श्रम पर आधारित है यहाँ तक महात्मा गाँधी ने भी इस बात को हरिजन पत्रिका में कहा था. इस के जबाब में बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने महात्मा गाँधी को बहुत ही खूबसूरत शब्दों में जबाबी पत्र में लिखा था:

“क्या आदमी को अपना पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए, वह अनैतिक पेशा ही क्यों ना हो? यदि प्रत्येक को अपना पैतृक पेशा ही जारी रखना पड़ेगा पड़े तो इसका अर्थ होगा कि किसी आदमी को दलाल का पेशा इसलिए जारी रखना पड़ेगा, क्योकि उसके दादा दलाल थे और किसी औरत को इसलिए वैश्या का पेशा अपनाना पड़ेगा, क्योकि उसकी दादी वैश्या थी.”

बाबा साहब ने यह उत्तर बहुत सोच समझ कर महात्मा गांधी और नेहरूके जीवन और उनके पूर्वजों को सामने रख कर दिया था. इस उत्तर से महात्मा गाँधी और नेहरूके पुरे जीवन और उनके पूर्वजों के बारे पता चलता है. अत: भारत में जाति प्रथा किसी भी प्रकार से श्रम विभाजन पर आधारित नहीं है.

जातिप्रथा धर्म के नाम पर मानव के द्वारा मानव के ऊपर जबरदस्ती थोपा गया क़ानून है.मेरा मानना है कि “हिन्दू कोई धर्म नहीं, वास्तविकता में रुढ़ीवादी कानूनों का एक पुलिन्दा है, जो कल आज और कल के लिए समान रुप से लागू होता है.” हिंदू का हर धर्म शास्त्र अपने आप में क़ानून है. ऐसा कानून जिसका पालन हर हिंदू के लिए करना जरुरी है फिर चाहे वो जातिप्रथा के किसी भी स्तर पर क्यों ना हो.मेरा मानना है कि हिंदू रहते हुए आप कभी भी वेदों, पुराणों, मनुस्मृति आदि के क़ानूनपर आधारित इस जातिप्रथा की गुलामी से बाहर नहीं निकल सकते. इसका सबसे अचछा उपाय भी बाबा साहब खुद बता कर गए है… धर्मान्तरण. लेकिन आज धर्मान्तरण करना क्या सही मायनों में इस समस्या का समाधान है? इस पर हम आगे विचार करेंगे.

भारत के लोग में मूलत: दो जाति के लोग रहते है पहले मूलनिवासी; जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसुचित जनजाति, दूसरे पिछड़े वर्ग, धर्मान्तरित अल्पसंख्यक,आदिवासी और भारत की समस्तनारियाँआती है. विज्ञान की भाषा में इन लोगों कोअफ्रीकन इंडियन कहते है. इस जाति के लोग भारत के बहुसंख्यक है. दूसरी जाति में ईसा से लगभग 3000 साल पहले यूरेशिया से भारत में समुद्र के रास्ते आये लोग हैइनमेंब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य नामक जाति के लोग आते है.इन लोगों को विज्ञान की भाषा में यूरेशियन कहा जाता है लेकिन यह लोग अपने साथ अपनी स्त्रियों को लेकर नहीं आये थे. यही मुख्य कारण है किब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के घरों की स्त्रियों को धर्म शास्त्रों के अनुसार शुद्र ही कहा जाता है. यह लोग अपने आपको आर्य भी कहते है. यही यूरेशियन वो लोग है जिन्होंने धोखे से या चालाकी से भारत के मूलनिवासियों को नीच शुद्र घोषित किया हुआ है. अर्थात अपने आपको शिक्षा, युद्ध या राज करनेऔर व्यापार के आधार पर बांटा है तथा मूलनिवासियों को शुद्र अर्थात सेवक बनाया हुआ है. यही वो लोग भी है जो धर्म के नाम पर मूलनिवासियों का शोषण करते है. उपरोक्त दोनों जातिओं पर आज तक बहुत से वैज्ञानिक शोध हो चुके है जिनमें माइकल बामशाद और राजीव दीक्षित केडीएनए शोध प्रमुख है. इन दोनों बुद्धिजीवियों ने डीएनए के आधार पर युरेशियनों को विदेशी और बाकी सभी जातियों और भारत की नारी को मूलनिवासी घोषित किया है.

कोई भी मूलनिवासी जाति (SC, ST, OBC) का सदस्य अगर चाहे तो भी वह हिंदू धर्म का हिस्सा बने रहने तक जातिप्रथा की गुलामी से नहीं बच सकता. मूलनिवासी तब तक यूरेशियन आर्यों का गुलाम ही रहेगा, जब तक वह हिंदू धर्म अर्थात युरेशियनों के धर्म को अपनाये हुए है. इस प्रकार मूलनिवासी किसी भी हाल में ब्राह्मणवाद से मुक्त नहीं हो सकता. यह सिर्फ हिंदुओं की बात नहीं है, मुस्लिम और ईसाई भी मूलनिवासियों को हेय दृष्टि से देखते है. क्योकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हर मूलनिवासी को नीच या शुद्र मनाता है. यह बात सही भी है, मूलनिवासी जातियों के लगभग सभी लोग अपनी रोजाना की जिंदगी में इन जाति प्रथा पर आधारित उंच नीच और शोषण की समस्याका सामना करते है. आज के समाचार पत्र हर रोज मूलनिवासियों पर यूरेशियन आर्यों के अत्याचारों के समाचारों से भरे रहते है. आज भी मूलनिवासियों को धार्मिक स्थानों में जाने की,ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के साथ खाने-पीनेकी, सार्वजनिक जलाशयों या जल स्त्रोतों से पानी लेने की, विवाह-शादियों में दुल्हे को घोड़े पर ले जाने की, ब्राह्मणों, क्षत्रियों या वैश्यों के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता बनाने की इजाज़त नहीं है.मूलनिवासियों की माँ-बेटी की इज्ज़त आज भी सुरक्षित नहीं है. मूलनिवासियों की बेटियों को मंदिरों में देवदासी तक बनाया जाताहै,मूलनिवासियों की हालत तो इतनी बुरी है कि एक ही वर्ण अर्थात शुद्र वर्ण का होने पर भी एक मूलनिवासी अपनी जाति से बाहरदूसरी मूलनिवासी जाति में शादी-ब्याह का रिश्ता तक स्थापित नहीं कर सकता.

भारत में नारियों की स्थिति तो इस से भी गई गुजरी है. आये दिन बलात्कार होना, लडकियों को बेच देना, लडकी को वस्तु समझ कर दान कर देना, सार्वजनिक स्थानों पर छेड़-छाड, स्कूलों और कॉलेजों में शारीरिक और मानसिक शोषण, कार्यस्थलों में नारी शोषण आदि जैसी घटनाएँ हर दिनलाखों के हिसाब से होती है. एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर छ: सेकिंड में नारी शोषण की एक घटना होती है इन सभी घटनाओं के पीछे भी जाति प्रथा मुख्य कारण है और दूसरा सबसे बड़ा कारण भारत की नारी का मूलनिवासी होना है, यही वह कारण है जिसके चलते ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और मूलनिवासियों की नारी पर समान रूप से अत्याचार होते है.

कोई मूलनिवासी जाति प्रथा से बाहर कुछ करता है या जाति प्रथा को तोडना चाहता है तो उसके लिए हिंदू धर्म में मनुस्मृति जैसे दंड विधानों का प्रावधान किया गया है जो आज भी सामाजिक मान्यताओं के रूप में देश के हर कोने में प्रचलित है और लोग परम्पराओं या मान्यताओं के रूप में उन शास्त्रोक्त कानूनों का पालन करते है. अत: जो कोई जाति प्रथा के खिलाफ जायेगा तो उसको सामाजिक दंड का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें समाज या जाति से बहिष्कृत तक कर दिया जाता है. इन सभी प्रकार की ज्यादतियों औरशोषण के लिए ब्राह्मणों द्वारा जनित जाति व्यवस्था ही हर प्रकार से जिमेवार है. क्योकि हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार जातियों का मिश्रण होने से बचाए रखने की परम्परा है. अगर एक जाति के लोग दूसरी जाति में शादी करना शुरू कर दे तो जातिप्रथा खत्म हो जायेगी. जातिप्रथा खत्म हो गई तो ब्राह्मणों की सर्वोपरिता खत्म हो जायेगी. कोई भी हिंदू धर्म का अनुयायी उपरोक्त नियमों को धर्म शास्त्रों के कानूनों और धर्म खोने के डर से नहीं तोडता, इसलिए जातिप्रथा हजारों सालों से जैसी थी वैसी ही बनी हुई है. उपरोक्त सभी बातों से यह बात सामने आती है कि हिंदू धर्म जातिप्रथा नाम कीगुलामी प्रथा पर आधारित है. जहाँ ब्राह्मण शीर्ष पर है वो सभी दूसरे वर्णों पर धर्म के नाम पर राज करता है और दूसरे सभी लोगों का शोषण करता है.इस प्रकार जो भी आदमी हिंदू धर्म का हिस्सा है वह हर प्रकार से गुलाम है.

अत: मूलनिवासी समुदाय (SC, ST, OBC) के लोगों के सामने इस गुलामी से निकलने का एक ही तरीका है “धर्मान्तरण”. धर्मान्तरण का अर्थ बाबा साहब के विचार से “नया जीवन” है जहाँ कोई गुलामी, छुआ छूत या भेद भाव ना हो. लोग समता, स्वतंत्रता, बंधुत्वऔर न्याय के शासन के अंतर्गत समान रूप से शासित हो. धर्मान्तरण का सबसे सकारात्मक पहलू है कि हिंदू धर्म छोड़ने के बाद कोई भी दूसरे धर्म को मानने वाला मूलनिवासी से घृणा नहीं करता और ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य भी दूसरा धर्म अपनाने पर भेद-भाव नहीं करते. धर्मान्तरित आदमी सभी के लिए बराबर हो जाता है, जैसे मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी और धर्म के आदमी के साथ ब्राह्मण व्यापार करता है, काम करता है या नौकरी करता है तो कोई हिन् भावना इनके बीच नहीं होती. यही बात सभी धर्मों के लोगों पर लागू होती है साथ काम करते हुए भी हिंदू धर्म का ब्राह्मण मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख आदि धर्मों के लोगों से कोई भेद भाव नहीं करता. इस प्रकार धर्मान्तरण करने पर मूलनिवासी एक प्रकार से जाति प्रथा की गुलामी और भेदभाव से मुक्त हो जाता है.

धर्मान्तरण करके मूलनिवासी कौन से धर्म को अपनाये यह भी एक गंभीर समस्या है. आज भारत का हर धर्म अपने आप में वर्गीकृत है. कोई समुदाय के नाम से वर्गीकृत है कोई जाति के नाम से वर्गीकृत है तो कोई धर्म अपने ही लोगों को हीन दृष्टि से देखता है. कुछ धर्म ऐसे है जो दूसरे धर्म से आने वाले लोगों को एक अलग श्रेणी में रखते है. इन सभी समस्याओं के चलते कोई भी मूलनिवासी धर्मान्तरण नहीं कर पाता. क़ानून अपने आप में एक समस्या है अगर कोई मूलनिवासी धर्म को छोड़ कर दूसरे धर्म में जाना भी चाहता है तो उससे तरह तरह के सवाल किये जाते है. एक तरह से उस मूलनिवासी को कानून के नाम पर उत्पीड़ित किया जाता है. अगर वह मूलनिवासी धर्म बदल नहीं सका तो उसको समाज में हेय दृष्टि से देखा जाने लगता है. उसके अपने ही समाज और जाति के लोग उस से घृणा करने लग जाते है. इस प्रकार की सभी घटनाओं के लिए भी यूरेशियन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही पूरी तरह जिम्मेवार है. देश के हर सरकारी तंत्र पर इनका कब्ज़ा है. आप जिस मर्जी सरकारी संस्थाके कार्यालय में जाओ आपको कार्यलय का मुख्य अधिकारी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ही मिलेगा और वो लोग जानबूझ कर मूलनिवासियों को नीचा दिखाते है. मूलनिवासियों के हालात तो इस कदर बुरे है कि उनको सरकारी कार्यालयों में कोई काम भी करवाना हो तो हज़ार तरह की शर्मिन्दगियाँ उठानी पड़ती है. संविधान में विशेष अधिकारोंऔरक़ानून के तहत बिशेष अधिकारों का प्रावधान होने पर भी मूलनिवासियों को प्रताड़ित और उत्पीड़ित किया जाता है.इस प्रकार अगर कोई मूलनिवासी चाहे भी तो भी जाति प्रथा की गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता. अब इस समस्या से मुक्त कैसे हुआ जाये?

इस समस्या से मुक्ति का मार्ग भारतीय संविधान और कानून में ही है. सबसे पहली बात कि मूलनिवासियों का शोषण क्यों होता है? भारतीय कानून और सामाजिक व्यवस्थाका अध्ययन करने से पता चलता है कि मूलनिवासी लोगों के शोषण का मुख्य कारण क़ानून के बारे पर्याप्त जानकारी ना होना ही है. देश की शैक्षणिक संस्थाओं में क़ानून के स्थान पर धार्मिक पुस्तकों को पढाया जाता है. जोकि मूलनिवासियों में फैले अन्धविश्वास और धर्म के प्रति आस्था के साथ साथ डर के लिए भी पूरी तरह से जिमेवार है. देश में महाराष्ट्र सरकार के द्वारा अन्धविश्वास निरोधी क़ानून पारित करने और उच्चतम न्यायलय द्वारा अन्धविश्वास के विरोध में हजारों आदेश देने के बाद भी देश के लगभग सभी राज्यों में धार्मिक पुस्तकों को शिक्षा के पाठ्यक्रममें शामिल किया गया है. रामायण, महाभारत जैसे काल्पनिक धर्म ग्रंथोंके विरोध में उच्चतम न्यायलय कई बार आदेश दे चुका है लेकिन फिर भी देश के यूरेशियन शासक अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बेशर्मों की तरह देश के स्कुल्लों और कॉलेजों में रामायण और महाभारत जैसे धर्म शास्त्रों को पढ़ा रहे है. अर्थात भारत में क़ानून की सही जानकारी ना होने के कारण मूलनिवासी अपने बच्चों को इन दकियानुसी किताबों को पढ़ने देते है. जबकि देश की केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों और उच्चतम न्यायलय को चाहिए कि वो इन दकियानुसी किताबों को पाठ्यक्रम से बाहर करके क़ानून को पढाने के सिफारिश करे. जिस से हर आदमी जागृत हो और अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति भी सजग हो.

भारत के संविधान के अंतर्गत अगर धारा25का अध्ययन करे तो पता चलता है कि क़ानून ही एक मात्र वह उपाय है जो मूलनिवासियों को जातिप्रथा की गुलामी से आज़ादी दिला सकता है. इस धारा के मुताबिक कोई भी देश का आदमी या औरत किसी भी धर्म या संप्रदाय को मानने या ना मानने के लिए स्वतंत्र है. कोई भी आदमी उसको किसी भी धर्म को मानने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. यही एक ऐसा उपाय है जो मूलनिवासी को जाति और धर्म नाम की गुलामी से हमेशा के लिए आज़ाद कर सकता है.उसके लिए मूलनिवासियों में दृढ इच्छा शक्ति का होना जरुरी है. इस प्रकार की आज़ादी की बहुत से मूलनिवासी अपने स्तर पर शुरुआत कर चुके है. लेकिन आरक्षण के लालच में फंसे मूलनिवासी आज भी इस प्रकार आज़ाद होने को तैयार नहीं है. मूलनिवासी यह नहीं समझ रहे कि आरक्षण आज एक ऐसी हड्डी बन चुकी है जो मूलनिवासियों को जातिप्रथा की दलदल में डुबो के रखने के सिवा कोई दूसरा काम नहीं कर रही है. केन्द्र सरकार से सुचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त सूचना के आधार पर देश की92% सरकारी नौकरियों पर ब्राह्मणों का कब्ज़ा है. अर्थात आरक्षण होते हुए भी मूलनिवासियों के पास आज कुछ भी नहीं है. आरक्षण का फायदा उस स्थिति में सही तरीके से होता जब शासन करने वाले अर्थात ब्राह्मण चाहता कि किसी और वर्ण को भी सरकारी नौकरियां मिले.भीम राव अम्बेडकर ने सही कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो, अगर सरकार उस संविधान को समाज में सही रूप से लागू ना करे तो अच्छा संविधान भी देश के नागरिकों के लिए बुरा बन सकता है.

यहाँ बहुत से मूलनिवासी तर्क देंगे कि अगर हमने धर्म परिवर्तित कर दिया तो हमें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा.मूलनिवासी लोगों को जब उनके भले की बात बताई जाती है और खास कर भले की बात बताने वाला कोई उनमें से ही हो तो उनके मन में सबसे पहले विरोधी विचार ही आते है. जैसे ऐसा क्यों? ऐसा कैसे? इस से क्या होगा? आदि. जबकि इसके विपरीत जब कोई ब्राह्मण या तथाकथित उच्च जाति का कोई आदमी उनको कोई भी बात बिना किसी प्रमाण के बोलता है या बताता है तो उनके मन में कोई भी प्रशन नहीं आता. आखिर ऐसा होता क्यों है? इसका सीधा सा उत्तर है मूलनिवासियों का मानसिक रूप से गुलाम होना. मूलनिवासी आत्मसमर्पण किये बैठे है और यह धारणा उनके मन में घर कर चुकी है कि ब्राह्मण श्रेष्ट है और देवता का अवतार है. यही वो मूल कारण है जिसके कारण मूलनिवासी कभी भी ब्राह्मणों से तार्किक प्रश्न नहीं करते. इसके विपरीत मूलनिवासी तो उन में से ही एक है तो उसकी बात का बिना सोचे समझे विरोध करना शुरू कर देते है. यहाँ बात हो रही है आरक्षण की. तो आपको बताना जरुरी समझूंगा कि पिछले 66 सालों में भी आपको सही रूप से आरक्षण का कोई फायदा नहीं हुआ है. आप लोग आज भी जिस आरक्षण की आस में जाति प्रथा कायम किये हुए हो उसका सीधा फायदा ब्राह्मण ही उठा रहा है. ज्यादा जानकारी के लिए हमारी पुरानी पोस्ट “आरक्षण का खून” पढ़े जिस में बताया गया है कि ब्राह्मण हम लोगों को कैसे गुमराह करके आरक्षण को दबा कर जाति प्रथा को बनाये रखता है और किस प्रकार से आरक्षण वाले राजकीय कार्यों में फायदा उठता है. एक सीधा सा उदाहरण; आज देश में 92% सरकारी नौकरियां ब्राह्मणों के पास है बाकी 8% नौकरियां क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों अर्थात मूलनिवासियों के पास है. वो भी चौथे दर्जे की. देश के हर शीर्ष पड़ पर ब्राह्मण विराजमान है. यहाँ बात केन्द्र सरकार से मंगवाई गई सुचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से से भी प्रमाणित होती है. केन्द्र सरकार से मिली जानकारी का अर्थ यह हुआ कि आरक्षण से मूलनिवासियों का हर हाल में शोषण या मूलनिवासियों को उनके अधिकारों से दूर रखने में ब्राह्मण वर्ग सफल हुआ है. मूलनिवासियों को आरक्षण का कोई लाभ सही मायनों में नहीं मिल पाया है.

उपरोक्त सभी बातों से साफ़ हो जाता है कि आज आरक्षण मूलनिवासियों के उत्थान के लिए नहीं, जाति व्यवस्था को बनाये रखने के लिए प्रयोग हो रहा है. मूलनिवासी आरक्षण के लालच में जातिप्रथा को कायम किये हुए है और ब्राह्मण इसका फायदा मूलनिवासियों को दबाये रखने के लिए कर रहा है. अब सवाल खड़ा होता है कि आज मूलनिवासियों को क्या करना चाहिए? तो मेरा सुझाव है; जो व्यवस्था हमारे समाज के लिए गुलामी को बनाये रखने के लिए ब्राह्मण का सहयोग कर रही है उस व्यवस्था को धीरे धीरे जरुरतमंदों के लिए छोड़ कर त्याग कर देना चाहिए. हमारे समाज के बहुत से लोग धीरे धीरे साधन सम्पन हो रहे है वो अच्छा कमाते है अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकते है या जो लोग सरकारी नौकरियों में है उन लोगों को चाहिए कि संविधान का पालन करते हुए अपनी जाति और धर्म को लिखना बंद कर देना चाहिए ताकि आरक्षण का लाभ एक गरीब और जरुरतमंद मूलनिवासी को मिल सके. इस प्रकार की व्यवस्था से हमारे समाज के लोगों को दो फायदे होंगे. पहला; जाति प्रथा खत्म हो जायेगी. दूसरा शोषित और दबे कुचले मूलनिवासियों को भी उत्थान का अवसर मिलेगा. इसलिए साधन सम्पन मूलनिवासियों को चाहिए कि समय के साथ जाट प्रथा को समाप्त करने का प्रयास करे.

उपरोक्त सभी बातों पर विचार करने से पता चलता है कि आरक्षण एक सुखी हुई हड्डी बन चुका है, हिंदू धर्म में रहते हुए मूलनिवासी समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता. मूलनिवासियों के सभी प्रकार के शोषण के लिए ब्राह्मण धर्म और स्वयं ब्राह्मण पूरी तरह जिम्मेवार है.ब्राह्मणों के स जातिप्रथा नाम के षड्यंत्र से बचने के हमारे पास सिर्फ दो ही उपाय है. पहला; धर्मान्तरण और दूसरा; संवेधानिक कानून. इन दो उपायों के सिवा कोई भी ऐसा उपाय नहीं है जो कारगर तरीके से देश से जातिप्रथा का उल्मुलन कर सके. जहाँ तक शिक्षा की बात है तो भारत में शिक्षा तकनीकी पर नहीं धर्म पर आधारित है. जब तक भारत में तकनीकी पर आधारित शिक्षा पद्धति की शुरुआत नहीं की जाती तब तक शिक्षा के माध्यम से जातिप्रथा को समाप्त करना एक स्वपन से ज्यादा कुछ नहीं है. महापुरुषों के विचार अपने समय और उस काल के परिवेश के अनुसार सही हो सकते है. लेकिन आज के समय और परिवेश को देखते हुए शिक्षा को देखते हुए यह कहना उचित नहीं है कि आप शिक्षा के माध्यम से जातिप्रथा से मुक्त हो सकते है. आप अपने पास के विद्यालयों में जा कर देखे. किताबी ज्ञान के बजाये धरातल पर जो हो रहा है उसका अध्ययन करे तो आपको समझ आएगा कि मेरा यह तर्क अन्यथा नहीं है. आज स्कूलों और कौलेजों में धर्म की शिक्षा का बोलबाला है दूसरा मूलनिवासी समाज के बच्चों के साथ तिरस्कार पूर्ण भेदभाव आज भी जारी है जिसके कारण मूलनिवासी समाज के बच्चे सही शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते. जब शिक्षा का स्तर सही नहीं है और पढाने वाले धर्म के चाटुकार है जिनको धर्म के सिवाए कुछ नहीं दिखता तो ऐसी शिक्षा से मूलनिवासी समाज का भला कैसे हो सकता है? इसी कारण में पहले जातिप्रथा को समाप्त करने और फिर शिक्षा पर बल देने की बात कर रहा हूँ. जाति प्रथा जब तक समाज में कायम रहेगी तब तक देश के मूलनिवासियों और उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अन्धकारमय ही है.

इसलिए सभी मूलनिवासियों से प्रार्थना है पहले धर्म को छोडो, क्योकि धर्म का जन्म ही मानव के हाथों मानव का शोषण करवाने के लिए हुआ है. उठो.. जागो.. और साथी को जागो.. यह सन्देश सभी मूलनिवासियों तक पहुंचाओ.. और जाति प्रथा का त्याग करके मानसिक आज़ादी को प्राप्त करो…

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7 Responses to जातिप्रथा और समाधान

  1. VK Mulnivasi says:

    VERY NICE POST .

  2. Yogendra Singh says:

    100 feesadi sahi bat kahi aap ne mulnivasio ko ek sath aana hoga

  3. Ram Babu says:

    waah! kya jaankari hai.

  4. Gautam says:

    Reblogged this on gautamkekalam.

  5. naresh says:

    hum savi aapke sath hai….jai bhim jai bharat

  6. laxminarayan says:

    एकदम सही बात है। ब्राह्मणों का विज्ञान एकदम गलत था। किस जीव विज्ञान में लिखा है कि सूर्य किसी नारी के साथ संभोग कर बच्चा पैदा कर सकता है? ऐसा सोचना भी मूर्खता है क्योंकि बिना संभोग तथा वीर्य (कोशिका) के बच्चा पैदा हो ही नहीं सकता। पर ये निकम्मे ब्राह्मण कुछ भी बोल सकते हैं, चाहे संभव हो या न हो। इसीलिए तो इन लोगों ने पूरे समाज को शिक्षा से अलग रखा ताकि हमारा पूरा समाज हमेशा मूर्ख बना रहे तथा ब्राह्मणों के पीछे-पीछे चलता रहे। आज भी हमारा समाज ‘पढ़ा-लिखा मूर्ख’ ही है तभी तो इनके सोच में जरा-सा भी सुधार नहीं हो रहा है।

  7. our ek baat he ki christian mante he our kehena he ki jisus crist bina pita ke pabitra atma dwara paida hua tha …sidha uper se without male…iska sach jhut kuchh kaise pata chalega…..sir ji bible me v likha he ki mare huye ko jinda karna andha ko dikhna aise bahat sare chamatkar bate likhi huye he…kya aisa koi shakti tha us ke pass…ajj v log dharmantar kar rahe he …wo sab bimari etc se bach ne ke liye…..thoda sa confuse lagta he sun ke padh ke…plz iska koi tathya he to bataye ye sir ji….isi sawal me hum v chup ho jate he ….

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