आरक्षण का खून


भारत को आज़ाद हुए 66 साल हो गए लेकिन आज भी बहुत से काम अधूरे है जिनका वर्णन संविधान में किया गया है। देश में बनने वाली हर सरकार को आदेश दिया गया था कि यह काम प्राथमिकता के आधार पर किये जाये। जैसे अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देना और आरक्षण को निश्चित समय सीमा में समाप्त करना। लेकिन आज तक देश में ऐसी कोई सरकार नहीं बनी है जिसने संविधान में वर्णित इन कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर किया हो। संविधान में प्रावधान किया गया था कि देश में जातिवाद को 30 सालों में पूरी तरह से खत्म करके, आरक्षण खत्म कर देना है। अर्थात यह काम 1980 तक हो जाना चाहिए था। लेकिंन ऐसा पिछले 66 सालों में नहीं हो सका है और ना ही इंडिया में आज तक बनी किसी भी सरकार ने इन कार्य को करने के लिए कोई योजना बनाई और ना ही कोई ठोस कदम उठाये है।

5644आज हम बात करेंगे आरक्षण के बारे में, जैसा की आप सभी को पता ही है कि आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिस पर आये दिन राजनीति होती रहती है। कोई कहता है आरक्षण बंद करो.. कोई कहता है आरक्षण को चलने दो, लेकिन आरक्षण के पीछे छुपी ब्राह्मणों की मंशा को शायद ही कोई समझ पाया हो। आखिर ऐसा क्या हो गया है कि 30 साल में पूरी होने वाली योजना 66 सालों में पूरी नहीं हो पाई? यह एक सोचने योग्य बहुत ही गंभीर मुद्दा है। जिस पर सभी लोगों को सोचना चाहिए। आज भी मूलनिवासी लोग आरक्षण की मांग करते है उसके पीछे मुख्य कारण है मूलनिवासी (SC, ST, OBC और आदिवासी) लोगों को सही रूप में उनका हक ना मिलाना। ब्राह्मण आरक्षण को बनाये रखना चाहता है क्योकि यहाँ एक ऐसी शर्त है जहाँ मूलनिवासी लोग आरक्षण के लालच में अपनी जाति को सरकारी कागजों में लिखते है और जाति प्रथा को बनाये रखते है। मूलनिवासी लोग आरक्षण के लालच में जाति प्रथा को कायम रखे हुए है और ब्राह्मण (विदेशी) लोग अपने धर्म शास्त्रों में बनाई गई जाति प्रथा को कायम रखने के लिए आरक्षण का फायदा उठा रहे है। अब सोचने वाली बात है कि इस में सही रूप में फायदा किसे हो रहा है? तो सीधी सी बात है कि इस में फायदा ब्राह्मण (विदेशी) को हो रहा है। आरक्षण के आधार पर जाति प्रथा कायम है, प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंतिम पड़ाव पर “साक्षात्कार” के नाम पर देश में सबसे ज्यादा धांधली होती है। जिसमें साक्षात्कार लेने या करने वाला आदमी अक्सर ब्राह्मण होता है और उसके हाथ में जितने नंबर होते है उनमें पास होना किसी भी नौकरी को प्राप्त करने के लिए बहुत जरुरी है। अगर आप ब्राह्मण, राजपूत या वैश्य को दिए साक्षात्कार में पास नहीं हो पाए तो आपको नौकरी नहीं मिलेगी। यही वो पड़ाव है जहाँ मूलनिवासियों को छांट छांट कर अलग कर दिया जाता है और यही मुख्य कारण है कि देश में आरक्षण या जातिवाद समाप्त नहीं हो पा रहा।

आज अगर यह कहा जाए कि आरक्षण और जातिवाद एक दूसरे के पूरक बन गए है तो कोई गलत बात नहीं होगी। आरक्षण के नाम पर ब्राह्मण धर्म का जातिवाद टिका हुआ है और आरक्षण ही इसका आधार है और यह कैसे किया जाता है यह भी समझने योग्य बात है। जब तक यह समझ नहीं आएगा तब तक इस पर बात करना अधूरा ही रहेगा। पिछले दिनों RTI के तहत मांगी गई सुचना के आधार पर पता चला है कि देश में लगभग 90% सरकारी नौकरियां ब्राह्मण वर्ग के पास है। क्षत्रिय, वैश्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दूसरे पिछड़े वर्ग और आदिवासियों के पास महज 10% नौकरियां है और वह भी तीसरी और चौथी श्रेणी की। देश के सभी सरकारी महकमों में शीर्ष पदों वाली नौकरियां केवल ब्राह्मणों के ही पास है। इस का फायदा ब्राह्मण वर्ग मूलनिवासियों को सरकारी नौकरियों में प्रवेश या नियुक्ति ना दे कर उठता है। मान लो किसी ने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया शारीरिक परिक्षण परीक्षा पास कर दी या लिखित परीक्षा पास कर दी। उसके बाद ब्राह्मण वर्ग दो तरीकों से आरक्षण का लाभ उठाने वाले लोगों अर्थात मूलनिवासियों को आरक्षण का लाभ उठाने से रोकता है। पहला तरीका है परीक्षा को रद्द कर दो और बाद में सार्वजानिक रूप से किसी को बिना बताये चुपचाप परीक्षा को बहाल करके, केवल ब्राह्मण वर्ग के परीक्षार्थियों को गुप्त रूप से सूचित करके साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है और उनको नौकरियों पर रख दिया जाता है। इस प्रकार से संविधान का भी उलंघन नहीं होता। क्योकि संविधान में क़ानून है कि अगर सरकारी नौकरी की परीक्षा के लिए कोई नहीं आता है तो जो लोग परीक्षा में आये है उनको ही नौकरियों पर रखा जाए। दूसरा तरीका है साक्षात्कार किसी ब्राह्मण के द्वारा किया जाए और साक्षात्कार में मूलनिवासियों को कम से कम अंक देकर सरकारी नौकरियों से बाहर रखा जाये। यह वो दो तरीके है जिनके आधार पर आज भी मूलनिवासियों को उनका हक या आरक्षण का सही रूप से कोई फायदा नहीं मिला है। और इसके लिए ब्राह्मण वर्ग ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है।

पिछले 66 सालों से लगातार यही सब होता आ रहा है और यह तब तक होता रहेगा, जब तक देश में ब्राह्मणों की हितैषी और मूलनिवासियों की विरोधी सरकार बनी रहेगी। जब तक ब्राह्मणवादी सरकार है देश जातिवाद की समस्या से मुक्त नहीं हो सकता और ना ही आरक्षण खत्म किया जा सकता है। आज समय आ गया है मूलनिवासी समुदाय के लोगों को आपसी जातिवाद को भुला कर रोटी और बेटी का रिश्ता कायम कर लेना चाहिए और ब्राह्मणों के द्वारा बनाया गए जातिवाद नाम के षड्यंत्र को तोड़ देना चाहिए। जो मूलनिवासी गरीब है केवल उन्ही को आरक्षण का लाभ उठाने दिया जाना चाहिए। बाकि सभी मूलनिवासियों को चाहिए कि जाति के नाम पर आरक्षण अपने गरीब भाइयों और बहनों के लिए छोड़ दे। इस से मूलनिवासी समाज को सीधा लाभ मिलेगा। एक तो जातिप्रथा समाप्त हो सकेगी, दूसरा आरक्षण का लाभ सही लोगों को मिलेगा। संविधान के आर्टिकल 25 के अनुसार कोई भी आदमी धर्म और जाति को लिखने या किसी को अपनी जाति या धर्म के बारे सुचना ना देने के लिए स्वतंत्र है। सभी मूलनिवासियों को इस का फायदा उठाना चाहिए।

आज भी देश में मूलनिवासियों (SC, ST, OBC और आदिवासियों) के लोगों के हाल इतने अच्छे नहीं है कि वो आरक्षण को छोड़ सके। लेकिन हमे यह समझना पड़ेगा कि मूलनिवासियों का शोषण क्यों हो रहा है? शोषण का मूलाधार है जातिवाद जब तक देश में जातिवाद रहेगा तब तक मूलनिवासियों का प्रगति करना असंभव ही नहीं नामुमकिन है। आरक्षण पर मूलनिवासियों का जन्म सिद्ध अधिकार है यह कोई खैरात नहीं है। आरक्षण 150 साल की लंबी लड़ाई के बाद और बहुत से मूलनिवासी नेताओं के बलिदानों के कारण मिला था। अगर मूलनिवासी लोग आरक्षण को छोड़ देते है तो एक तरह से महापुरुषों के अपमान भी होता है लेकिन हमें आज की स्थिति को समझना पड़ेगा और जरुरत के आधार पर आरक्षण का का प्रयोग करना पड़ेगा। मूलनिवासियों की असली लड़ाई जातिवाद के खिलाफ होनी चाहिए ना की आरक्षण के खिलाफ, क्योकि जब तक आरक्षण है तब तक जातिवाद है के सिद्धांत को भी समझना पड़ेगा। जब तक मूलनिवासी अपने खिलाफ रची गई साजिश को नहीं समझ पाएंगे तब तक जातिवाद से मुक्त नहीं हो पाएंगे।

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3 Responses to आरक्षण का खून

  1. Vimal Meena says:

    SC ST OBC Yekta Jindabad

  2. Pingback: जातिप्रथा और समाधान | Bheem Sangh

  3. Kataria says:

    Very nice. We should do as discussed above.

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