आरक्षण “संरक्षण”


सत्ता” जिनकी होती है उन्हे “आरक्षण”की जरूरत नहीं पड़ती। ambedkar3“आरक्षण”-“संरक्षण” की जरूरत उन्हें होती है जिनके पास “सत्ता” नहीं होती।”असंरक्षित” वह होता है जो अपना “संरक्षण” करने लायक नहीं होता। “भारत के लोगों” को किनसे अपने “संरक्षण” के लिए “आरक्षण” की जरूरत आ पड़ी है? क्या कभी सुना कि “मुगलों” ने आरक्षण “संरक्षण” माँगा हो? क्या कभी सुना कि “अंग्रेजों” ने आरक्षण “संरक्षण” माँगा हो ? हम “आरक्षण-संरक्षण” उनसे ही माँग सकते हैं जो दे सकते हैं अथवा जिनकी “सत्ता” है। हम उन्हीं से “आरक्षण” माँग रहे हैं जो हमारे “पतन” के लिए उत्तरदायी हैं क्योंकि आज भी वे अल्पसंख्यक होने के बावजूद “सत्ता” के मालिक हैं व देने की हैसियत में हैं। हमने ही उन्हें इस “हैसियत” तक पहुंचाया है और वे हमारे “हित” के बारे में हमेशा “अगर-मगर” करते हैं। जो हमारे “पतन” के जिम्मेदार हैं वे असीम शक्ति के मालिक हैं , प्रतिदिन “आनंद-उत्सव” मना रहे हैं।क्या वे हमें “सबल” बनाकर अपनी “असीम शक्ति” व आनंद-उत्सव ” का परित्याग कभी करेंगे? डॉ आंबेडकर ने “गोलमेज़” से “सत्ता” लायी थी ,”गांधीजी” जानते थे इसीलिए वे मरने को तैयार हो गए लेकिन “सत्ता” देने को नहीं। “गांधीजी” ने उसे “आरक्षण” में बदल दिया। “आरक्षण” दिया लेकिन “सत्ता” नहीं दी। “सत्ता” जिनकी होती है उन्हें “आरक्षण” की जरूरत नहीं पड़ती। “आरक्षण”-“संरक्षण” की जरूरत उन्हें होती है जिनके पास “सत्ता” नहीं होती। जिसके पास “सत्ता” होती है वह “विद्रोह की प्रकृति” की गंभीरता व अनुपात देखते हुये “लाभ देने -नहीं देने ” “कम करने -अधिक करने”का निर्णय लेता है लेकिन “सत्ता” छोड़ने का निर्णय तब तक नहीं लेता जब तक कि उसे मजबूर न कर दिया जाए। “हम भारत के लोग” का तात्कालिक कदम यह होना चाहिए कि हम “ब्राह्मणो” को अपना नेता/तारणहार मानना छोड़ दें। दीर्घ कालीन कदम यह होना चाहिए कि “ब्राह्मणो से हमेशा के लिए आज़ादी” की लंबी लड़ाई के लिए तैयार हो जाएँ क्योंकि भारत में विकसित द्विदलीय ब्राह्मणी “लोकतन्त्र” के माध्यम से “ब्राह्मणो” को “सत्ताच्युत” करना अब “संभव” नहीं है।”सत्ता” जिनकी होती है उन्हें “आरक्षण” की जरूरत नहीं पड़ती। “आरक्षण”-“संरक्षण” की जरूरत उन्हें होती है जिनके पास “सत्ता” नहीं होती।आरक्षण प्रतिनिधित्व है प्रतिनिधित्व लोकतंत्र का प्राणतत्व है और किसी भी लोकतांत्रिक देश मे वहा के लोगो को उनके जनसंख्या के अनुपात मे प्रतिनिधित्व होना आवश्यक होता है तभी उस देश को लोकतांत्रिक देश कहा जाता है। परंतु प्रतिनिधित्व को आरक्षण नाम देने से न्यायपालिका को गलत व्याख्या करने का मौका मिल गया। प्रतिनिधित्व को आरक्षण इसलिए कहा गया है क्योकि अगर कोई समुदाय उस जगह तक पहुँच नही पाया तो उस जगह पर कोई दूसरा कब्जा कर सकता है। जिससे लोकतंत्र को नुकसान हो सकता है । इसी कारण उस जगह को आरक्षित जगह कहा गया है। ताकि कोई शर्मा,, जोशी; कुलकणी जैसे लोग उस जगह कब्जा करके खुद न बैठ जाए।
सत्ता

रिज़र्वेशन का इतिहास …..रिज़र्वेशन की बात आते ही पिछड़ी जात के ”राष्ट्र-पिता” ज्योतिराव फूले का नाम सबसे पहले आता है, जब ”हंटर कमिशन” को भारत मे शिक्षा की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत भेजा तब ”हंटर कमिशन” के सामने पहली बार ज्योतिराव फूले पिछड़ी जातिओ की दशा, और पिछड़ी जातियो पर ब्राह्मण जात के वर्चस्व का विवरण रखते है, और भारत के इतिहास मे पहली बार पिछड़ी जात के लोगो की रिज़र्वेशन की माँग करते है, इसके बाद शाहूजी महाराज, जो की कोल्हापुर रियासत के राजा थे, वो अपने जन्म दिन के अवसर पर अपने रियासत मे पिछड़ी जातियों को नौकरी मे 50% रिज़र्वेशन देते है, तब इस बात से ब्राह्मण जात नाराज़ हो जाती है और एक सांगली जिले का ब्राह्मण साहू महाराज को कहता है कि इससे आप के काम काज की गुणवत्ता खराब हो जाएगी, तो शाहू जी महाराज उस ब्राह्मण को अपने घोड़ो के अस्तबल मे ले जाते है और अपने एक सिपाही से कहते है ”इन घोड़ो के लिए थोड़ी दूर चना रखो और सारे घोड़ो को छोड़ दो” ,सिपाही वैसा ही करता है तब मजबूत घोड़े कमजोर घोड़ो को दबाकर सारा चना हजम कर जाते है और कमजोर घोड़े भूखे ही रह जाते है, ये होने के बाद शाहू महाराज उस ब्राह्मण से कहते है, आप ब्राह्मण लोग भी हम पिछड़ी जात के लोगो के हिस्से का भी खा जाते हो, इसलिए मैने जैसे कमजोर जानवरो के साथ न्याय किया और सभी के हिस्से का खाना अलग अलग उनकी छोलि मे डाल दिया, उसी तरह पिछड़ी जात के लोगो के हिस्से का ”रिज़र्वेशन” द्वारा पिछड़ी जात के हिस्से मे डाल दिया और न्याय किया। ब्राह्मण फिर भी, जैसे आज रिज़र्वेशन का विरोध करते है तब भी करते थे, एक बार एक ब्राह्मण ने पिछड़ी जात के एक कर्मचारी पर आरोप लगाया की ये पिछड़ी जात का कर्मचारी रिज़र्वेशन से नौकरी पा गया पर ये कार्यक्रम नही है, तो साहू महाराज ने उस ब्राह्मण कर्मचारी से कहा की, हे ब्राह्मण जात आप ही इस पिछड़ी जात के असक्षम आदमी को 3 महीने के अंदर कार्य में सक्षम बनाकर दिखाओ, नही तो यह समझा जाएगा की आप भी कार्य में सक्षम नही हो और आप की नौकरी चली जाएगी ,तो 3 महिने तक उस ब्राह्मण ने उस पिछड़ी जात से कोई काम नही लिया और 3 महीने बाद उसे मेरिट का सर्टिफिकेट दे दिया / मतलब ब्राह्मण को गुणवत्ता से कोई लेना देना नही है सिर्फ़ पिछड़ी जात के रिज़र्वेशन के विरोध के लिए एक ना एक बहाना ढूंढता रहता है,इस तरह से रिज़र्वेशन का इतिहास आगे बढ़ता है और इसके बाद ”डॉ बाबासाहब और ओबीसी का रिश्ता?” 
इस देश में ओबीसी का ‘संवैधानिक जन्मदाता’ और ‘संवैधानिक रखवाला’ कोई और नहीं बल्कि ”डॉ बाबासाहब आंबेडकर” ही है।
सबूत =
1928 में बोम्बे प्रान्त के गवर्नर ने ‘स्टार्ट’ नाम के एक अधिकारी की अध्यक्षता में पिछड़ी जातियों के लिए एक कमिटी नियुक्त की थी. इस कमिटी में डो. बाबा साहेब आम्बेडकर ने ही शुद्र वर्ण से जुडी जातियों के लिए “OTHER BACKWARD CAST ” शब्द का उपयोग सब से प्रथम किया था, इसी शब्द का शोर्टफॉर्म ओबीसी है, जिसको सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी हुई जाति के रूप में आज हम पहचानते है और उनको पिछड़ी जाति या ओबीसी कहते है।
स्टार्ट कमिटी के समक्ष अपनी बात रखते हुए डॉ बाबा साहेब आम्बेडकर ने देश की जनसंख्या को तीन भाग में बांटा था।
– – – -(1) अपरकास्ट(Upercast) जिसमे ब्राह्मण, क्षत्रिय-राजपूत और वैश्य जैसी उच्च वर्ण जातियां आती थी।
– – – -(2) बेकवर्ड कास्ट(Backward cast) जिसमे सबसे पिछड़ी और अछूत बनायीं गई जातियां और आदिवासी समुदाय की जातियां को समाविष्ट की गई थी।
– – – -(3) जो जातियां बेकवर्ड कास्ट और अपर कास्ट के बीच में आती थी ऐसी शुद्र वर्ण की मानी गई जातियो के लिए Other backward cast शब्द का प्रयोग किया गया था, जिसको शोर्टफॉर्म में हम ओबीसी कहते है।
बाबासाहब ने ही संविधान की 340 धारा में ओबीसी को पहचान उनकी गिनती कर उनको उनकी संख्या के अनुपात में जातिगत आरक्षण का प्रावधान किया ,क्योंकि  उस समय तक ओबीसी कीजातियों की लिस्ट ही नहीं बनी थी।
बाबासाहब ने ही ओबीसी के संवैधानिक 340 कलम को लागू करवाने का दबाव ,ब्राह्मणी कांग्रेस पर डाला ,पर ब्राह्मणी कांग्रेस का ब्राह्मण प्रधानमन्त्री नेहरू तैयार नहीं हुआ इसीलिए बाबासाहब ने अपने कैबिनेट मंत्री पद और ब्राह्मणी कांग्रेस दोनों से इस्तीफा दे डाला।
ओबीसी के लिए कैबिनेट स्टार के मंत्रिपद को लात मारनेवाला भारत का एक मात्र नेता ”बाबासाहब आंबेडकर” ही है, पर यह बात आज तक ओबीसी से ब्राह्मणों ने छुपायी।
बाबा साहब के दबाव के कारण ही बाद में ब्राह्मण नेहरू ने ब्राह्मण जात काका कालेलकर को ओबीसी की जातियों को पहचानने के लिए कमिशन बनाया 
-संविधान की कलम 340 के अनुसार राष्ट्रपति एक कमीशन नियुक्त करेंगे और कमीशन ओबीसी जातियों की पहचान करके उनके विकास के लिए जो सिफारिशे करेगा उनको अमल में लायेंगे। संविधान की कलम 15-(4), 16(4) के अनुसार ओबीसी जातियों के सरकारी तन्त्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए सरकार उचित कदम उठाएगी।
-शासन और प्रशासन में प्रभुत्व जमाये बैठे ब्राह्मणी जातिवादियो ने ”ओबीसी” के लिए नियुक्त काका कालेलकर (ब्राह्मण जात का) कमीशन रिपोर्ट 1953-1955 के रिपोर्ट को संसद की समक्ष भी नहीं रखा और कालेलकर कमीशन रिपोर्ट को कभी भी मान्यता नहीं दी या लागु भी नहीं किया।
-1978 में केन्द्र सरकार ने ओबीसी के लिए दूसरा कमीशन बीपी मंडल की अध्यक्षता में नियुक्त किया। मंडल कमीशन रिपोर्ट-1980 को भी सत्ता मे प्रभुत्व जमाये बैठे जातिवादियो ने लागु करने की जरुरत नहीं समझी और 1989 तक मंडल रिपोर्ट सचिवालय की अलमारी में धुल खाते रहा।
-7 अगस्त 1990 के दिन केन्द्र सरकार ने देश के 52 % ओबीसी समुदाय के लिए मंडल कमीशन की सिफ़ारीश अनुसार केन्द्रीय नौकरियों में 27 % ओबीसी आरक्षण लागु करने की घोषणा की, जिसके विरोध में ब्राह्मणों ने देशभर में मंडल विरोधी आंदोलन प्रारंभ किया।
—— -मंडल कमीशन की दूसरी सिफारिश शिक्षा मे 27 % आरक्षण देरी से 2006-7 मे लागु किया गया।

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One Response to आरक्षण “संरक्षण”

  1. Mahadeo Mane says:

    kindly write article on why reservation is based on caste system and not on economy

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