Diwali Ka Sach


दीपावली का अर्थ है दीपों कि पंक्ति, अर्थात अँधेरे से उजाला, लेकिन कौन सा उजाला और कौन सा अंधकार? दीपावली अर्थात युरेशियनों की भारत के मूल निवासियों अर्थात नागवंशियों पर विजय प्राप्त करने का दिन। आज युरेशियनों के बनाये त्यौहार भारत के मूल निवासियों के खून और मानसिकता में ऐसे बस गए है कि कोई सोचने को तैयार ही नहीं है कि इन त्यौहारों के पीछे छिपी सच्चाई क्या है। जो भी यूरेशियन आर्यों ने बोला सारा समाज उसी के पीछे भाग रहा है। कारण पर नज़रें डाली जाये तो तो कारण साफ़ साफ़ नज़र आता है और वो है हजारों सालो की अनपढ़ता, हजारों सालों से ज्ञान से दूर रहना और युरेशियनों की मूल निवासियों को सच से दूर रखने की कोशिशें और मूल निवासी नागवंशियों पर किये गए अत्याचार। इतिहास का अध्ययन करे तो समझ आ जाता है कि युरेशियनों ने क्यों और कब कब ऐसे त्यौहार बनाये। आज हम लोग आपको दीपावली की सच्चाई और मूल निवासी नागवंशियों के सचे इतिहास से रूबरू करवाते है।
Deevali ka sachमहिषासुर का इतिहास: सबसे पहले यह त्यौहार उस समय बनाया गया था, जब दुर्गा नाम की औरत ने नागवंशियों के राजा महिषासुर का वध किया था। अगर JNU दिल्ली के द्वारा किये गए शोध का अध्ययन किया जाये तो पता चलता है कि महिषासुर मूल निवासियों के एक राजा था। मूल निवासी जिनको ईसा से 3200 साल पहले नागवंशी कहा जाता था। फिर समय अनुसार द्रविड़ और आज मूल निवासी कहा जाता था। उस समय पुरे एशिया महादीप को चमार दीप कहा जाता था। तो एशिया के निवासियों को चमारभी कहा जाता था। क्योकि चमार दीप के वासी चमार ही हुए। कालांतर में यूरेशियन आये चमार दीप पर हजारों युद्ध लड़े गए, चमार दीप का विघटन हुआ और चमार दीप का नाम जम्बार दीप रखा गया। जिसे को बाद में जम्बू दीप कर दिया गया। 800 ईसवी में देश का नाम आर्यवर्त रखा गया और 1600 ईसवी में देश का नाम मनु महाराज के बेटे भरत के नाम पर भारत रखा गया। आज़ादी के बाद संसद में बहुमत से प्रस्ताव पारित कर के देश का नाम इंडिया रखा गया। अब हम बात करते है महिषासुर के बारे, JNU के शोधों से पता चलता है कि महिषासुर नागवंशियों के राजा था। जो बहुत वीर और पराक्रमी राजा था। जिसको मारने की यूरेशियन आर्यों की हर कोशिश नाकाम रही थी। विदेश आर्य ब्रह्मा और विष्णु को महिषासुर कई बार हरा चूका था, किसी भी विदेशी आर्य में इतना साहस नहीं था कि सीधे जा कर महिषासुर से युद्ध कर सके। तो सभी विदेशी यूरेशियन आर्यों ने एक चाल चली जो छल कपट से पारी पूर्ण थी। सभी विदेशी आर्यों ने एक औरत का सहारा लिया जिस का नाम दुर्गा था। दुर्गा को महिषासुर के राज महल में भेजा गया, ताकि दुर्गा धोखे से महिषासुर का वध कर सके। दुर्गा ने वही किया, दुर्गा 9 दिन महिषासुर के राज महल में रही। 9 दिनों तक सभी आर्य महिषासुर के महल के आसपास छूपे रहे और इंतजार करते रहे कि कब दुर्गा महिषासुर को धोखे से मारेगी। 9 दिन दुर्गा को सफलता मिली और जब दुर्गा को सफलता मिली तो सभी आर्यों ने महिषासुर के महल में घुस कर मूल निवासियों पर आक्रमण कर दिया। हजारों मूल निवासियों को मौत के घाट उतरा गया। आर्यों ने शंकर की पहली पत्नी गौरा की तरह मूल निवासियों के सिर काट कर उनकी मालाएं बना कर दुर्गा के गले में डाल दी और मूल निवासियों को धोखे में रख कर दुर्गा को गौरा का अवतार बताया ताकि कोई भी नागवंशी विद्रोह ना करे और विदेशी आर्यों को अपना राजा स्वीकार कर ले। अगर आज भी गौरा और दुर्गा की मूर्तियों को ध्यान से देखा जाये तो काली कलूटी गौरा के गले में श्वेत रंग के युरेशियनों के सिरों कि माला दिखाई देती है परन्तु इसके विपरीत दुर्गा के गले में काले अर्थात नागों के कटे सिर दिखाई देते है। इस प्रकार विदेशी आर्य मूल निवासियों पर अपनी सता स्थापित करने में सफल हुए। महिषासुर को मरने की ख़ुशी में कुछ दिन बाद जो जश्न बनाया गया उसी को आज दीपावली कहा जाता है। अपने ही राजा की मृत्यु को सारे नागवंशी अर्थात चमार अर्थात मूल निवासी आज बहुत धूम धाम से बनाते है। अर्थात मूल निवासियों पर विजय को ही यहाँ पर दीपावली कह कर बनाया गया।

नरसिंह का अवतार का इतिहास: कहा जाता है कि विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर मूल निवासी राजा हिरण्यकशपु को मारा था तब से भी दीपावली मनाई जाती है। इस कहानी में बताया गया है की हिरण्यकशपु को मारने के लिए विष्णु नाम के आर्य ने नर सिंह अवतार लिया था। इस कहानी में विष्णु नाम के आर्य ने आधे मानव और आधे सिंह के रूप में अवतार लिया था। लेकिन असल में हुआ यह था कि हिरणायक्ष को मौत के बाद भी उसके भाई हिरण्यकशपु का राज्य बहुत से दक्षिण भारत के द्वीपों पर बाकि था, हिरण्यकशपु को भी प्रत्यक्ष युद्ध में हराना आर्यों के बस की बात नहीं थी। हिरण्यकशपु को देख कर ही आर्य भाग खड़े होते थे। हिरण्यकशपु बहुत शक्तिशाली राजा था। जिसे युद्ध क्षेत्र में तो क्या कोई भी मूल निवासी या आर्य नहीं हरा सकता था। इस लिए आर्यों ने हिरण्यकशपु को मरने के लिए भी छल और कपट का सहारा लिया। आर्यों ने हिरण्यकशपु के बेटे प्रलाह्द को अपनी चाल का मोहरा बनाया। जिस आश्रम में प्रह्लाह्द शिक्षा ग्रहण करने जाता था। उस आश्रम का अध्यापक एक आर्य था। सभी आर्यों ने उस अध्यापक को अपनी और मिला कर और नारद मुनि नाम के अध्यापक को खास तौर पर भेज कर प्रह्लाह्द के मन में वही भगवान् का डर बिठा दिया। जो आज हर मूल निवासी के मन में बैठा हुआ है। विष्णु को महान बता कर उसको भगवान् बता कर प्रह्लाह्द को आर्यों ने अपनी तरफ कर लिया। प्रह्लाह्द ने अपने पिता हिरण्यकशपु के साथ गद्दारी की और विष्णु को भेष बदलवाकर अपने साथ राज महल में ले गया। विष्णु प्रत्यक्ष युद्ध में तो हिरण्यकशपु को हरा नहीं सकता था तो विष्णु नाम के आर्य ने एक योजना के तहत शाम के समय हिरण्यकशपु के घर के अन्दर प्रवेश करते समय दरवाजे के पीछे से प्रहार कर दिया। जिस से हिरण्यकशपु का पूरा पेट फट गया और हिरण्यकशपु की मृत्यु हो गई। बाद में मूल निवासियों को बहुत सी काल्पनिक कहानियां बना कर सुनाई गई। बहुत से झूठे वरदानों की काल्पनिक कहानियां बनाई गई। जैसे की हिरण्यकशपु को वरदान था कि उसे अन्दर-बाहर, ऊपर नीचे, घर में-घर से बाहर और पता नहीं कौन कौन सी जगहों पर मारा नहीं जा सकता था। विष्णु को भगवान् बताया गया। मूल निवासियों को कही सच्चाई का पता ना चल जाये इसलिए विष्णु को नर सिंह अवतार घोषित किया गया। अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि ऐसा मनुष्य होना असंभव है जो आधा आदमी और आधा सिंह हो। यह सब कथाएं आर्यों ने सिर्फ अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए बनाई है और दीपावली के नाम पर मूल निवासी राजा कि मृत्यु का जश्न बनाया गया।

राम का इतिहास: राम जब रावन नाम के मूल निवासियों के हितैषी राजा का वध कर के वापिस अयोध्या पहुंचा था तब अयोध्या यूरेशियन आर्यों ने रात्रि में दीपक जलाकर मूल निवासियों के हितैषी राजा रावन की मृत्यु का जश्न बनाया था। राम कितनी मर्यादा का पालन करता था ये बात आप लोगों को सची रामायण पढ़ कर पता चल जाएगी। अब आप लोग बोलोगे कि हम सची रामायण को क्यों माने? तो आप लोगों की जानकारी के लिए बता दें, सच्ची रामायण नामक पुस्तक को सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने मान्यता दी है। जब सुप्रीम कोर्ट सच्ची रामायण को मान्यता दे सकता है तो मूल निवासी सच्ची रामायण को क्यों मान्यता नहीं देते। रामायण के अनुसार राम का जन्म एक यज्ञ के कारण हुआ था। जिसको पुत्रेष्टि यज्ञ कहा गया है, वैदिक काल में यज्ञ का मतलब होता था भोग विलास और सोमरस पान। उस समय के यज्ञ को आप आज की “फुल मून पार्टी” कह सकते हो। जहा पर नशा और सम्भोग का खुला नंगा नाच होता था। उसे यज्ञ कहा जाता था। दशरथ ने भी ऐसे ही एक यज्ञ का आयोजन किया, पुरे भारत से बहुत से ब्राह्मणों को बुलाया गया। दशरथ ने सभी ब्राह्मणों में से तीन ब्राह्मण चुने और अपनी तीनों रानियों को उन ब्राह्मणों को सम्भोग कर के बच्चे अपीडा करने के लिए दिया। दशरथ खुद 60 साल का बुढा था और बच्चे पैदा करने कि क्षमता खो चूका था। इस प्रकार कई दिनों तक उन ब्राह्मणों ने यज्ञ के नाम पर कौशल्या, सुमित्रा और कैकई के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये और इसके परिणाम स्वरूप राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरत पैदा हुए। रामायण को अगर ध्यान से पढ़ा जाये तो पता चलता है कि राम एक बहुत ही नीच आदमी था। राम अपने बाकि भाइयों से बहुत नफरत और इर्ष्या करता था। राम ने अपने पिता दशरथ के साथ मिल कर भरत को जानबूझ कर उसके नाना के घर भेज दिया था। ताकि राम खुद अयोध्या का राजा बन सके। कैकई जो की एक सच्ची और ईमानदार औरत थी उसको रामायण में बहुत ही नीच औरत बताया गया है। आखिर अपना हक मांगना कौन सी नीचता है? दशरथ ने वचन दिया था कि कैकई कि संतान को राजा बनाएगा। परन्तु दशरथ अपना वचन पूरा नहीं करना चाहता था। अयोध्या काण्ड में इस बात का प्रमाण मौजूद है। राम के मन की स्थिति का भी यहाँ से पता चलता है कि राम भी राजा बनाना चाहता था। इस लिए वो दशरथ का विरोध नहीं करता है। दूसरी तरफ सीता की बात की जाये, तो सीता भी कोई अच्छे चरित्र कि नारी नहीं थी। सीता जमीन से पैदा नहीं हुई थी, क्योकि वैज्ञानिक दृष्टि से किसी भी मनुष्य का पैदा होना असंभव है। सीता जनक की एक रखैल कि बेटी थी, जिसके साथ जनक के नाजायज सम्बन्ध थे। इस बात को सीता ने कई बार रामायण में कहा है सीता कहती है “मैं बचपन से जवानी तक धुल में रही, अज्ञान के कारण मेरे माता पिता ने मेरी कोई परवाह नहीं की” अर्थात सीता कोई चरित्रवान औरत नहीं थी। वो किसी वैश्या या रखैल कि पुत्री थी। जिसको जनक उसकी जवानी में अपने घर ले के आया था। अब बात करते है असुर राज रावण की। रावण कितना बड़ा ज्ञानी और पराक्रमी राजा था ये बात उसके चरित्र से ही पता चल जाती है। रावन को दस आदमियों से भी ज्यादा ज्ञान था। इस लिए रावण के दस सिर प्रचारित किये गए। रावण से विष्णु, ब्रह्मा से लेकर सभी यूरेशियन आर्य डरते थे और उस के साथ आमने सामने की लड़ाई में कई बार हार चुके थे। रावण को उस समय के पुरे चमार दीप के राजा शंकर का आश्रीवाद या सहयोग प्राप्त था। जिसको बाद में वरदान कह कर प्रचारित किया गया। एक बार रावण जब राजा शंकर से मिलने गया तो वापिस लंका आते समय उसकी दृष्टि एक ऋषि कन्या पर पड़ी, रावण उस ऋषि कन्या से विवाह करने के लिए उस कन्या से जोर जबरदस्ती करता है। उसी के परिणाम स्वरुप कन्या रावण को श्राप देती है कि अगर आज के बाद तुमने किसी पवित्र नारी को उसकी इच्छा के बिना छुआ तो तुम्हारा सिर फट जायेगा और पूरा शारीर जल जायेगा। लेकिन बाद में रावण सीता को गोद में उठा का ले जाता है। अगर सीता सत्ती और पवित्र थी तो रावण का सिर क्यों नहीं फटा और उसके पुरे शारीर में आग क्यों नहीं लगी? इस का अर्थ सीधा सा है कि सीता एक दुष्ट चरित्र वाली वैश्या थी। ये बात भी सारी दुनिया जानती थी कि रावण यज्ञ जैसे कु-कृत्यों के खिलाफ था क्योकि यज्ञों के नाम पर होने वाली जीव हिंसा, मंदिर पान और शारीरिक सम्बन्धों कहा तक न्याय संगत है। आज सारा देश “फुल मून पार्टियों” का विरोध करता है, अगर कही कोई “फुल मून पार्टी” मनाता या आयोजन करता मिल जाता है तो उसे पुलिस उठा कर जेल में डाल देती है। तो रावण ने कौन सा बुरा काम किया था? सीता के साथ रावण के शारीरिक सम्बन्ध थे या नहीं इस बात का पता इस बात से चल जाता है कि जब रावण सीता के पास अशोक वाटिका में जाता है तो सीता कहती है “ मैं इस समय तुम्हारे अधिकार में हूँ, तुम राजा जो जो चाहे कर सकते हो” मतलब सीता ने सीधे तौर पर कोई स्वीकृति नहीं दी, लेकिन सीता के रावण के साथ भी शारीरिक सम्बन्ध थे।
अब रावण को मारा कैसे गया ये भी सारी दुनिया जानती है। रावण को धोखे से विभीषन के साथ मिल कर मारा गया। युद्ध में रावण को मारा इस बात का भी कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। ब्राह्मणों की लिखी रामायण के अनुसार अंतिम युद्ध सिर्फ रावण और राम के बीच ही हुआ था। बाकि सभी लोग आराम कर रहे थे। और उस समय वहां पर रात जैसा माहौल था। इसका मतलब है कि राम ने रावण को धोखे से मारा रात के समय मारा होगा। विभीष्ण ने रावण का राज्य हड़पने के उदेश्य से रावण को मारने में राम का साथ दिया। क्योकि सिर्फ विभीष्ण को ही लंका के अन्दर जाने और रावण तक पहुँचने का रास्ता मालूम था। जब राम सीता को लेकर वापिस अयोध्या पहुंचा तो उसने भरत को हटा कर अपना राज्य स्थापित किया। भरत पहले ही राम से डरा डरा रहता था तो उसने ज्यादा आना कानी नहीं कि और राम को राजा बना दिया गया। फिर अयोध्या में एक दिन राम की एक दासी राम को आकर कहती है कि “सीता रावण की याद में रो रही है, सीता ने रावण का चित्र बनाया है और उसे सीने से लगा कर आंसू बहा रही है और सीता गर्ववती है” राम का गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच जाता है वो सीता के कमरे में जाता है तो सच में सीता को रावण के चित्र से लिपटे हुए और आंसू बहते हुए पता है। जिस के कारण राम सीता को घर निकल देता है। इस से सिद्ध हो जाता है कि लव और कुश रावण की संतान थे जिनको बाद में अयोध्या से दूर अफ्गानिस्तान में भेज दिया गया था। 
राम के द्वारा शम्भुक नामक शुद्र का वध भी एक उलेखनीय तथ्य है। अयोध्या में राम राज्य स्थापित होने के बाद एक दिन एक ब्राह्मण अपने मृत बेटे के शव को उठा कर राम के दरबार में ले कर आता है और राम को बताता है कि उसके गॉव के पास एक शम्भुक नाम का शुद्र भगवान् का नाम ले रहा है जीके कारण ब्राह्मण के बेटे की मृत्यु हो गई। ब्राह्मण का बच्चा अपनी मृत्यु मारा किसी के भगवान् को पूजने या ना पूजने से ब्राह्मण के बेटे का क्या सम्बन्ध? लेकिन नहीं राम ने बिना सोचे समझे ब्राह्मण की बातों में आ कर शम्भुक के आश्रम पर धावा बोल दिया। शम्भुक अकेला था, उसने खुद को राम से हवाले कर दिया और राम ने निर्दयिता पूर्वक शम्भुक का सिर काट कर शम्भुक की हत्या कर दी। राम के समय भी रावण जैसे महाज्ञानी और पराक्रमी राजा को जो मूल निवासियों के हित में सोचता था उसकी मृत्यु को दीपावली के नाम से मनाया गया।

कृष्ण का इतिहास: कहा जाता है कि कृष्ण ने एक मूल निवासी राजा नरकासुर को ठीक इसी दिन मारा था। और इस दिन को दीपावली के रूप में मनाया जाना शुरू किया गया था। कहा जाता है नरकासुर ने 16000 औरतों को बंदी बनाया था और नरकासुर भी यज्ञों के परम विरोधी था। वो विदेशी आर्यों से नफरत करता था। यहाँ पर सोचने कि बात है जो नरकासुर यज्ञ जैसे कृत्यों का विरोधी था वो 16000 औरतों को कैसे बंदी बना सकता था? असल में कृष्ण ने नरकासुर को धोखे से मारा था। जिस के लिए कृष्ण ने नरकासुर के महल में प्रवेश किया उसकी रानी से नरकासुर की मृत्यु का राज जाना और धोखे से नरकासुर का वध कर दिया। बाद में अपनी हवस को पूरा करने के लिए नरकासुर के राज्य से मूल निवासियों की पत्नियों, बेटियों और बहुओं को उठा कर अपने साथ ले गया था। जिसको बाद में ब्राह्मणों ने कृष्ण को भगवान् साबित करने के लिए 16000 औरतों को मुक्त करना बताया। यहाँ पर भी मूल निवासी राजा की मृत्यु को ही दीपावली कह कर मनाया गया। मूल निवासी लोग इस बात का सच ना जान ले इसलिए काल्पनिक कहानियां बनाई गई।

लक्ष्मी का इतिहास: दीपावली के दिन कहा जाता है कि धन कि देवी लक्ष्मी लोगों के घरों में आती है। इस लिए लोगों को अपने घरों में दीपक जलने चाहिए। ये बात भी तर्क संगत नहीं मानी जा सकती क्योकि लक्ष्मी का वाहन उल्लू है जिसको उजाले में कुछ भी दिखाई नहीं देता। तो लक्ष्मी का उल्लू उज्जाले में कैसे उड़ कर घर में आ सकता है? लक्ष्मी के बारे जानकारी मिलती है कि लक्ष्मी समुद्र मंथन से पैदा हुई थी वो भी जवानी में। उसका बचपन कैसे बिता? बचपन में कहा रही? ये बात किसी को पता नहीं है लेकिन ये बात सभी को पता है कि लक्ष्मी ने कई अवतार लिए जैसे सीता, रुक्मणी आदि। अगर वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये तो ये असंभव सी बात है। कोई भी इंसान इतने सारे अवतार कैसे ले सकता है? असल में लक्ष्मी के बदचलन और आवारा औरत थी, जिसके साथ विष्णु ने विवाह किया और उसके शारीरिक सम्बन्ध बहुत से आर्यों के साथ थे। जिनको कालांतर में ब्राह्मणों ने देवता घोषित कर दिया, लक्ष्मी भेष बदल बदल कर सभी आर्यों कि हवस को पूरा करती थी। उसी को बाद में अवतार कह कर प्रचारित किया गया।

ऊपर लिखित सभी घटनाओं से सिद्ध होता है कि जब जब विदेशी आर्यों ने मूल निवासी नागों के राजाओं पर विजय प्राप्त की तब तब दीपावली बनाई गई। और भारत के सारे मूल निवासी बिना सच जाने विदेशी युरेशियनों की विजय को आज भी पुरे हर्षो उल्लास से मानते है। अब सारे मूल निवासी सोचो क्या दीपावली जैसे त्यौहार हम मूल निवासियों को बनाने चाहिये? क्या हमे हमारे पतन के कारणों का जश्न बनाने का अधिकार है? क्यों ना हम सब मिल कर इन मूल निवासियों पर युरेशियनों की विजय के त्योहारों को बनाना बंद कर दे? हमारी पूरी टीम के लोगों का तो यह मत है कि ऐसे त्योहारों का बहिष्कार होना चाहिए।

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11 Responses to Diwali Ka Sach

  1. Pingback: Ram Ka Sach | Mulnivasi Foundation

  2. Sandeep kumar says:

    I m going with u

  3. Atul Sonawane says:

    Jai Mulnivasi..!
    Jo Dharm ek ko Uncha aur dusre ko Nicha dikhaye wo Dharm nahi balki Gulam Banaye rakhane ka Sanghatan Hai.!
    Bahujano ko Aaryon ki ideology ko samaj ne ki jarurat hai.

  4. balwinder singh says:

    jarurat hai ehse gyan ko har chamar ke ghar tak phuchane ke ,ta ke har mulnivasi bharaman jal se nekal sake

  5. vijay kumar says:

    its reality if u watch is type of serials seriously u will find this truth although these serials are manupulated

  6. Gurdeep Singh says:

    वेबसाइट के कई articles पड़े आर्यों और मूलनिवासियों के बारे में उन पर यकीन सा भी होने लगा था हालांकि मैं एक सिख होने के कारन ज़ात पात में विशवास नहीं रखता और ये भी नहीं कह सकता की मैं मूलनिवासी हूँ या आर्य हूँ क्यूंकि कभी इस के बारे में सोचा ही नहीं क्यूंकि हम तो सदा “मानस की ज़ात सबै ऐके पहचानबो ” और ” अवल आल्हा नूर उपाया कुदरत के सब बन्दे ” वाली विचारधारा से प्रेरेरित रहे हैं .
    खैर यहाँ मेरा मुददा ये है की जैसे जैसे मैं इस वेबसाइट के articles पड़ रहा हूँ confuse हो रहा हूँ इस समय मेरी सबसे बड़ी confusion ये है की एक article में लिखा है रामायण राजा ब्रह्दत को धोखे से मारने वाले पुष्यमित्र युंग के राज कवि वाल्मीकि द्वारा लिखी गयी काल्पनिक कहानी है वास्तव में कोई राम या रावण नहीं थे और दूसरी तरफ एक article में राम का इतिहास भी लिख डाला की राम एक नीच इंसान था और उसने धोखे से सम्राट शंकर का समर्थन प्रापत मूलनिवासियों के हितैषी राजा रावण को मारा था
    इसी प्रकार एक लेख में लिखा है की महाभारत नाम की काल्पनिक पुस्तक ब्रह्मिनो ने मूलनिवासियों को मूर्ख बनाने के लिए लिखी है और दुसरे लेख में कृष्ण की बुराईयों का भी इतिहास लिख दिया
    अब एक ही वेबसाइट पर किसी एक ही चरित्र के बारे में अलग अलग कहानियाँ पड़ने से confusion तो होगी ही तो कृपया इस confusion का समाधान करें धनयवाद

  7. Suresh Kumar meghwal says:

    You are right

  8. rijvam says:

    Sir aap bol rhe hai ki Shankar ,shiv ,Vishnu,brhamma,Indra,kishna,etc sabhi bhagwan nahi hai San me sab insan the to, is brahammand ya shrishtee ka nirmarn kisne kiya ,kisne banaya??
    Can you tell me right answer? Pls!

    • GAURAV MALAVIYA says:

      YEH SAB KISINE NAHI BANAAYA, APNE AAP HI BANA HAIN.
      BIGBANG THEORY KE ANUSAAR BRAHMAND KI UTPATI HUI HAIN.
      MAGAR YEH SACH HAIN KI IN SAB DEVTAO KO BRAHMAN NE HI BANAAYA HAIN.

  9. sach batane ke liye thanks

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