Avtaro Ka Sach


अवतारों का सच:
1. मत्स्यावतार: आर्यों के वेदों और पुराणों में वर्णित मत्स्य अवतार का गहन अध्ययन करने से और हजारों शोधों का अध्ययन करने से पता चलता है कि यह एक झूठी कहानी है। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ और ना ही आज तक पूरी दुनिया में कोई ऐसा इंसान हुआ जो व्हेल मछली जैसी भीमकाय मछली को अपने वश कर सके। ब्राह्मणों ने मत्स्य अवतार बना कर पहली ईसवी से उन्नीस ईसवी तक के समय में तो मूल निवासियों को मुर्ख बना लिया लेकिन आज बीसवी ईसवी में किये गए हजारों शोधों से यह बात साबित हो गई है कि मत्स्य अवतार की कथा सिर्फ एक झूठ है। तो सच क्या है?
avtaro-ka-sachसच यह है कि ईसा से 3200 साल पहले यूरेशिया में एक क्रूर जाति उत्पात और विनाश मचाती रहती थी। जिस का नाम “मोगल” था। वहां के शासकों ने उस जाति के सभी आदमियों को पकड़ कर एक बड़ी नाव में बिठा कर बीच समुद्र में छोड़ दिया, और आशा की कि यह जाति समुद्र में दफ़न हो जाये। लेकिन यह भारत जिसको उस समय चमार-दीप कहा जाता था, का दुर्भाग्य था, कि मोगल जाति के लोग भारत में पहुँचे। इसी से मत्स्य अवतार का उदय हुआ। कई दिनों तक समुद्र में भटकने के बाद युरेशियनों को जमीन दिखाई दी थी। इसी से युर्शियनों ने ये कल्पना भी गढ़ी थी कि धरती पानी में स्थित है। 19वी सताब्दी तक सारे भारत के मूल निवासी यही मानते थे कि धरती पानी में है। युरेशियनों ने मत्स्य अवतार की कहानी अपने आप की श्रेठ साबित करने के लिए गढ़ी थी और अपने आपको देवता सिद्ध कर दिया था। बाद में इस कहानी को आगे पीछे कर के वेदों और पुराणों में स्थापित किया गया ताकि किसी को सच्चाई पता ही ना चले। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ, और ना ही यूरेशियन देवता थे। आज ये सच्चाई साडी दुनिया जानती है।

2. कुर्मावतार: वेदों और पुराणों में लिखी हुई कुर्मा अवतार की कहानी भी मत्स्य अवतार की तरह सिर्फ एक झूठ ही है। जब कभी समुद्र मंथन ही नहीं हुआ, तो कुर्मा अवतार कैसे हो गया? अगर कुछ लोग यहाँ सवाल करे तो उन से हमारे कुछ सवाल है: 1. क्या यूरेशियन पानी पर चलते थे? 2. यूरेशियन पानी पर चलते थे तो वह कौन सी तकनीक थी? 3. अगर असुर अर्थात राक्षस भी थे, तो असुर को पानी पर चलने की तकनीक कैसे चली? पानी पर चलने की तकनीक पर तो यूरेशियन आर्यों का एकाधिकार था। 4. अगर यूरेशियन आर्य धनवंतरी ने ही अमृत लाना था तो आर्यों ने खुद अपने आर्य भाई धनवंतरी को अमृत लेन को क्यों नहीं कहा? 5. असुरों और आर्यों ने सुमेरु पर्वत को कैसे समुद्र में स्थापित किया और सुमेरु पर्वत को वापिस उसी जगह कौन रख कर गया? 6. लक्ष्मी अपनी जवानी तक समुद्र में क्या कर रही थी? 7. युरेशियनों ने तो अमृत पिया था, तो वो मर क्यों गए? आज तक उस समय का कोई आर्य जिन्दा क्यों नहीं नहीं है?
तो इन सभी सवालों का यह अर्थ निकालता है की समुद्र मंथन कभी नहीं हुआ। यह एक काल्पनिक कहानी है। असल में असुर और आर्यों के संग्राम में आर्यों को हार का मुह देखना पड़ा। सारे आर्य डर के मारे समुद्र के किनारे जा छुपे, और भारत (चमार दीप) छोड़कर भागने वाले थे। उस समय धुर्त विष्णु नाम के आर्य ने कछुए वाली निति अपनाई और कछुए के समान शांत रह कर मूल निवासियों के साथ संधि कर ली। यह संधि आर्यों के लिए अमृत के समान सिद्ध हुई, और आर्यों को भारत (चमार दीप) को नहीं छोड़ना पड़ा। यह संधि समुद्र के किनारे बहुत दिनों के विचार विमर्श के बाद हुई थी इसीलिए समुद्र के किनारे किये गए विचार विमर्श को समुद्र मंथन और उस से निकले परिणाम को आर्यों ने अमृत कहा। कुर्मा अवतार की कहानी तो बाद में युरेशियनों ने अपनी महानता सिद्ध करने के लिए गढ़ी थी। उस समय वह ना तो कोई समुद्र मंथन हुआ और ना ही कोई अमृत नाम की चीज या पेय पदार्थ निकला था। ना समुद्र मंथन हुआ, ना अमृत निकला, अपनी हार को भी इन विदेशी ब्राह्मणों ने अपनी महानता में बदल दिया।

3. वराह अवतार: वराह अवतार की कथा भी हिन्दू पुराणों में बहुत ही गलत ढंग से बताई गई है, जिसमें बताया गया कि हिरणायक्ष ने धरती को चुरा लिया था। धरती को चुरा कर हिरणायक्ष ने पानी में छुपा दिया। विष्णु सूअर बना और हिरणायक्ष को मार कर विष्णु ने धरती को पानी से बाहर अपने दांतों पर निकला। अब यह कितना सत्य है यह तो पाठकगण पढ़ कर ही समझ गए होंगे। बिना बात को घुमाये आप लोगों को सची घटना के बारे बता देते है। असल में हुआ यूँ था की हिरणायक्ष दक्षिण भारत के प्रायद्वीपों का एक महान मूल निवासी राजा था। जिसने सभी यूरेशियन आर्यों को दक्षिण भारत में मार और डरा कर सभी द्वीपों भगा दिया था। देवताओं ने बहुत सी युक्तियाँ लगा ली थी परन्तु हिरणायक्ष एक अपराजय योद्धा था, जिसे कोई भी आर्य प्रत्यक्ष युद्ध में हरा नहीं सकता था। हिरणायक्ष ने सारी दक्षिण भारत के सभी द्वीपों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर दिया था। दक्षिण भारत में और उसके आस पास के द्वीप पानी में स्थित थे और आर्यों का उन द्वीपों पर से राज्य समाप्त हो गया था। तो इस घटना को पृथ्वी को पानी के अन्दर ले जा कर छुपाना प्रचारित किया गया। हिरणायक्ष को हराने के लिए एक बार फिर विष्णु ने छल कपट का सहारा लिया और हिरणायक्ष को युद्ध करने समुद्र में ललकारा। पानी में युद्ध करते समय विष्णु ने धोखे से हिरणायक्ष के सर के पीछे वार किया और हिरणायक्ष को मार दिया। हिरणायक्ष को मारने के बाद आर्यों का कुछ द्वीपों पर फिर से राज्य स्थापित हो गया। मूल निवासी कभी इस घटना की सच्चाई ना जन ले इस लिए आर्यों ने विष्णु को भगवान् और हिरणायक्ष को राक्षस या असुर बना कर आम समाज के सामने प्रस्तुत किया। अब अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि यह घटना एक दम काल्पनिक है। क्योकि समुद्र धरती पर है ना की धरती समुद्र में। तो यहाँ प्रश्न उठता है अगर हिरणायक्ष ने धरती को समुद्र में छुपाया तो कैसे? इतना बड़ा समुद्र कहा है जिस मैं पृथ्वी समा सके? ना तो कोई विष्णु अवतार हुआ और ना ही पृथ्वी को पानी के अन्दर छुपाया गया। यह सिर्फ मूल निवासियों को मुर्ख बनाने की चाल मात्र थी।

4. नर सिंह अवतार: नर सिंह अवतार भी मात्र एक कोरी कल्पना है। इस कहानी में बताया गया है की हिरण्यकशपु को मारने के लिए विष्णु नाम के आर्य ने नर सिंह अवतार लिया था। इस कहानी में विष्णु नाम के आर्य ने आधे मानव और आधे सिंह के रूप में अवतार लिया था। लेकिन असल में हुआ यह था कि हिरणायक्ष को मौत के बाद भी उसके भाई हिरण्यकशपु का राज्य बहुत से दक्षिण भारत के द्वीपों पर बाकि था, हिरण्यकशपु को भी प्रत्यक्ष युद्ध में हराना आर्यों के बस की बात नहीं थी। हिरण्यकशपु को देख कर ही आर्य भाग खड़े होते थे। हिरण्यकशपु बहुत शक्तिशाली राजा था। जिसे युद्ध क्षेत्र में तो क्या कोई भी मूल निवासी या आर्य नहीं हरा सकता था। इस लिए आर्यों ने हिरण्यकशपु को मरने के लिए भी छल और कपट का सहारा लिया। आर्यों ने हिरण्यकशपु के बेटे प्रलाह्द को अपनी चाल का मोहरा बनाया। जिस आश्रम में प्रह्लाह्द शिक्षा ग्रहण करने जाता था। उस आश्रम का अध्यापक एक आर्य था। सभी आर्यों ने उस अध्यापक को अपनी और मिला कर और नारद मुनि नाम के अध्यापक को खास तौर पर भेज कर प्रह्लाह्द के मन में वही भगवान् का डर बिठा दिया। जो आज हर मूल निवासी के मन में बैठा हुआ है। विष्णु को महान बता कर उसको भगवान् बता कर प्रह्लाह्द को आर्यों ने अपनी तरफ कर लिया। प्रह्लाह्द ने अपने पिता हिरण्यकशपु के साथ गद्दारी की और विष्णु को भेष बदलवाकर अपने साथ राज महल में ले गया। विष्णु प्रत्यक्ष युद्ध में तो हिरण्यकशपु को हरा नहीं सकता था तो विष्णु नाम के आर्य ने एक योजना के तहत शाम के समय हिरण्यकशपु के घर के अन्दर प्रवेश करते समय दरवाजे के पीछे से प्रहार कर दिया। जिस से हिरण्यकशपु का पूरा पेट फट गया और हिरण्यकशपु की मृत्यु हो गई। बाद में मूल निवासियों को बहुत सी काल्पनिक कहानियां बना कर सुनाई गई। बहुत से झूठे वरदानों की काल्पनिक कहानियां बनाई गई। जैसे की हिरण्यकशपु को वरदान था कि उसे अन्दर-बाहर, ऊपर नीचे, घर में-घर से बाहर और पता नहीं कौन कौन सी जगहों पर मारा नहीं जा सकता था। विष्णु को भगवान् बताया गया। मूल निवासियों को कही सच्चाई का पता ना चल जाये इसलिए विष्णु को नर सिंह अवतार घोषित किया गया। अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि ऐसा मनुष्य होना असंभव है जो आधा आदमी और आधा सिंह हो। यह सब कथाएं आर्यों ने सिर्फ अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए बनाई है।

5. वामन अवतार: यह भी भी एक काल्पनिक कथा है। आप पाठकगण जरा दिमाग पर जोर डालो कोई वामन अर्थात आर्य ब्राह्मण इतना बड़ा हो सकता है कि पूरी पृथ्वी को अपने पाँव के नीचे ला सके। इतनी बड़ी पृथ्वी तो उस मनुष्य के पाँव के नीचे आएगी जो कम से कम पृथ्वी से 80% बड़ा हो। अगर वामन अर्थात ब्राह्मण पृथ्वी से 80% बड़ा हो भी गया तो वो खड़ा कहा था? असल में हुआ ये था कि मूल निवासी राजा महाराज बलि उस समय भारत के बहुत शक्तिशाली राजा थे। सारे आर्य उनसे डरते थे। किसी भी विदेशी आर्य में इतना साहस नहीं था कि आमने सामने की लड़ाई में महाराज बलि को हरा दे। तो आर्यों ने एक छल कपट भरी चाल चली। कुछ ब्राह्मणों को बलि के पास भेजा और मूल निवासी राजा को यज्ञ करने के लिए तैयार किया। मूल निवासी राजा भी ब्राह्मणों की बातों में आ कर यज्ञ के लिए तैयार हो गए। अब महाराज बलि को पूरा यज्ञ करने के लिए ऋग्वेद की सभी बातों को मानना था। जब यज्ञ पूरा हुआ तो ब्राह्मणों के अनुसार यज्ञ के बाद सभी ब्राह्मणों को दान दे कर संतुष्ट करना जरुरी था। क्योकि ऐसा ऋग्वेद में लिखा हुआ है। उस समय एक ब्राह्मण वहा पर आया, जोकि युरेशियनों द्वारा पहले से ही बनाई गई योजना के तहत वहा पर पहुंचा था। उसने महाराज बलि को धोखे से वचन लेकर उसकी मांग पूरी करने पर विवश किया। उस समय महाराज के मूल निवासी गुरु शुक्राचार्य ने महाराज बलि को समझाया भी कि बिना जाने वचन देना अच्छी बात नहीं है। परन्तु महाराज बलि पर तो काल्पनिक स्वर्ग का नशा चढ़ा हुआ था। महाराज बलि से तीन वचन ले कर उस ब्राह्मण ने पहले वचन में महाराज बलि से सारी धरती अर्थात जहाँ जहाँ महाराज बलि का राज है वो सारी धरती मांग ली। दुसरे वचन में समुद्र अर्थात समुद्र में स्थित महाराज बलि के राज्य में आने वाले सभी द्वीपों की धरती मांग ली। और तीसरे वचन में महाराज बलि का सिर मांग लिया। ताकि महाराज बलि जिन्दा ही ना रहे और भविष्य में महाराज बलि द्वारा फिर से युद्ध द्वारा राज्य छिनने के डर ही ना रहे। इस प्रकार धोखे से महाराज बलि को मारा गया और मूल निवासियों को बता दिया गया कि विष्णु ने महाराज बलि को स्वर्ग को भेज दिया। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था ये सारी कहानी भी मूल निवासियों को मुर्ख बनाने के लिए गढ़ी गई थी और मूल निवासी आज भी ब्राह्मणों की बताई गई झूठी कहानी पर विश्वास करते है। विज्ञान के बजाये अंधविश्वासों पर विश्वास करना आज भी मूल निवासियों की गुलामी का कारण बना हुआ है।

6. परशुराम अवतार: परशुराम का विवरण महाबरत और रामायण दोनों काल्पनिक ग्रंथों में आता है। लेकिन सचाही क्या है कोई नहीं जानता और ना ही जानना चाहता है क्योकि ब्राह्मण समाज लोगों को सच्चाई जानने नहीं देना चाहता। हर ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य परशुराम को अजेय और भगवान् बनाने पर तुला हुआ है। परशुराम कोई भगवान् नहीं है और ना ही जिन्दा है, ये शाश्वत सत्य है। महाराज बलि की मृत्यु के बाद ब्राह्मणों और राजपूतों में बंटे हुए युरेशियनों में लड़ाई हो गई कि ब्राह्मणों और राजपूतों में कौन श्रेष्ठ है। ब्राह्मणों ने छल से राज्य हासिल किया था और राजपूत बल में विश्वास करते थे। इसी विरोध के चलते ब्राह्मणों ने राजपूतों को मारने और अपने से नीच साबित करने के लिए एक और चाल चली। ब्राह्मणों ने अपने एक योद्धा को लड़ाई के लिए तैयार किया, जिसका नाम परशुराम था। परशुराम कुल्हाड़ा चलने में पारंगत था। परशुराम एक आर्य था। तो उसको रूद्र मूल निवासी कोई परसा अर्थात कुल्हाड़ा कैसे दे सकता था? ब्राह्मणों ने राजपूतों में अफवाह फैला दी कि परशुराम को सम्राट शिव संरक्षण प्राप्त है कि परशुराम राजपूतों का विनाश करे। इसी संरक्षण को बाद में आर्यों ने वरदान नाम से प्रचारित किया। अगर वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाये तो परशुराम के समय शिव नाम के रूद्र अर्थात मूल निवासी राजा को मरे हुए कई साल हो गए थे। लेकिन ब्राह्मणों को पता था कि अगर ऐसी अफवाह फैलाई जाये कि परशुराम को मूल निवासी राजा रुद्रों का संरक्षण प्राप्त है तो कोई भी राजपूत परशुराम का विरोध नहीं करेगा और हजारों राजपूत बिना किसी खास मेहनत के मार जायेंगे। क्योकि महा शक्तिशाली और पराक्रमी रूद्र सम्राटों से पुरे भारत के लोग डरते थे। ब्राह्मणों की अफवाह का यही परिणाम भी निकला, हजारों राजपूत डर कर खुद ही मरने के लिए तैयार हो गए। परशुराम की कथा को पढ़ा जाये तो ये बात सपष्ट हो जाती है कि हजारों राजपूतों ने खुद ही अपने परिवार के साथ आत्मदाह कर लिया था। जब देश से राजपूतों की संख्या काफी कम हो गई तब परशुराम नाम के ब्राह्मण को शांति प्राप्त हुई। अगर हम परशुराम का जीवन चरित्र भी देखे तो बहुत सी बातों का पता चलता है कि परशुराम एक नीच गिरा हुआ और क्रूर प्रकृति आदमी था। परशुराम ने अपने पिता के दुसरे विवाह करने में मदद की थी। परशुराम ने अपनी माता को सिर कट कर सिर्फ इस लिए मार दिया था ताकि ऋषि जमदग्नि दूसरी शादी कर सके। जिसे बाद में ब्राह्मणों ने माँ को फिर से जिन्दा करना प्रचारित किया। परशुराम ने सिर्फ ब्राह्मणों की सर्व श्रेष्टता को साबित करने के लिए हजारों राजपूतों को मौत के घाट उतरा था परन्तु ब्राह्मणों के झूठे प्रचार के कारण आज भी राजपूत ब्राह्मणों की गुलामी कर रहे है। अब तो ये मानसिकता राजपूतों में ऐसे घर कर गई है कि कोई भी राजपूत ब्राह्मणों के खिलाफ आवाज उठाना ही नहीं चाहता।

7. राम अवतार: पूरा रामायण एक काल्पनिक कहानी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ना तो राम मर्यादा पुरषोंतम था और ना ही रावण की लंका समुद्र पार थी। राम का जन्म एक यज्ञ के माध्यम से हुआ था। यज्ञ की सचाई आप हमारी दूसरी पोस्ट पर भी पढ़ सकते हो। उस समय दशरथ की उम्र 60 साल की हो चुकी थी और दशरथ बच्चे पैदा करने में असमर्थ था। तो दशरथ ने अपनी पत्नियाँ ब्राह्मणों को दे कर बच्चे पैदा करने की योजना बनाई। तो पुरे देश से ब्राह्मण बुलाये गए, अभी ब्राह्मणों में से तीन ब्राह्मण चुने गए। और उनको दशरथ ने अपनी तीनों रानियाँ सम्भोग करने को दी। इस विधि को उस समय “नियोग विधि” कहा जाता था। तीनों ब्राह्मणों ने दशरथ की तीनों रानियों के साथ कई दिनों तक शारीरिक सम्बन्ध बनाये और उसके परिणाम स्वरूप राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम के चार पुत्र दशरथ को प्राप्त हुए। पाठकगण खुद सोच सकते है ऐसे घटिया कृत्य से प्राप्त राम भगवान् कैसे हो सकता है। राम बहुत गिरा हुआ और नीच आदमी था। यह बात आपको विस्तार से “सची रामायण” से पता चल सकती है। “सची रामायण” सभी पाठकगण ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड कर सकते है और पढ़ सकते है। सची रामायण सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रमाणित किताब है। बाद में ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्टता साबित करने के लिए राम को भी भगवान् बना दिया। और इतना ज्यादा प्रचारित किया कि देश का हर आदमी आज राम को भगवान् की तरह पूजता है।

8. कृष्ण अवतार: कृष्णा अवतार के तो कहने ही क्या। दुनिया का सबसे बड़ा ढोंग कृष्ण को भगवान् प्रचारित करने को बोला जा सकता है। उस कृष्ण को भगवान् बना दिया, जो गाँव की लड़कियों और औरतों को नंगे नहाते हुए देखता था। जिस के नन्द गाँव की हर औरत के साथ शारीरिक सम्बन्ध थे। कृष्ण के शारीरिक सम्बन्ध कुवारी और विवाहित दोनों स्त्रियों के साथ थे। इस विषय पर लगभग सारा साहित्य एक मत है। कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:
‘ ता: वार्यमाणा: पतिभि: पितृभि्भ्रातृभिस्तथा,
कृष्ण गोपांगना रात्रौं रमयंती रतिप्रिया :’ -विष्णुपुराण, 5, 13/59.
अर्थात वे रतिप्रिय गोपियाँ अपने पतियों, पिताओं और भाइयो के रोकने पर भि रात में कृष्ण के साथ रमण करती थी . कृष्ण और गोपियों का अनुचित सम्बन्ध था यह बात भागवत में स्पष्ट रूप से मोजूद हैं, ईश्वर अथवा उस के अवतार माने जाने वाले कृष्ण का जन सामान्य के समक्ष अपने ही गाँव की बहु बेटियों के साथ सम्बन्ध रखना क्या आदर्श था?
कृष्ण ने गोपियों के साथ साथ ठंडी बालू वाले नदी पुलिन पर प्रवेश कर के रमण किया. वह स्थान कुमुद की चंचल और सुगन्धित वायु आनंददायक बन रहा था. बाहे फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ दबाना, बाल (चोटी) खींचना, जंघाओं पर हाथ फेरना, नीवी एवं स्तनों को चुन, गोपियों के नर्म अंगो नाखुनो से नोचना, तिरछी निगाह से देखना, हंसीमजाक करना आदि क्रियाओं से गोपियों में कामवासना बढ़ाते हुए कृष्ण ने रमण किया. – श्रीमदभागवत महापुराण 10/29/45
कृष्ण ने रात रात भर जाग कर अपने साथियो सहित अपने से अधिक अवस्था वाली और माता जैसे दिखने वाली गोपियों को भोगा. – आनंद रामायण, राज्य सर्ग 3/47
कृष्ण के विषय में जो कुछ आगे पुरानो में लिखा हैं उसे लिखते हुए भी शर्म महसूस होती हैं की गोपियों के साथ उसने क्या-क्या किया इसलिए में निचे अब सिर्फ हवाले लिख रहा हूँ जहा कृष्ण ने गोपियों के यौन क्रियाये की हैं –
– ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय
28-6/18, 74, 75, 77, 85, 86, 105, 109,110,
134, 70.
कृष्ण का सम्बन्ध अनेक नारियों से रहा हैं कृष्ण की विवाहिता पत्नियों की संख्या सोलह हज़ार एक सो आठ बताई जाती हैं. धार्मिक क्षेत्र में कृष्ण के साथ राधा का नाम ही अधिक प्रचलित हैं. कृष्ण की मूर्ति के साथ प्राय: सभी मंदिरों में राधा की मूर्ति हैं. लेकिन आखिर ये राधा थी कौन? ब्रह्मावैवर्त पुराण राधा कृष्ण की मामी बताई गयी हैं. इसी पुराण में राधा की उत्पत्ति कृष्ण के बाए अंग से बताई गयी हैं ‘कृष्ण के बायें भाग से एक कन्या उत्पन्न हुई. गुडवानो ने उसका नाम राधा रखा.’
– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 5/25-26
‘उस राधा का विवाह रायाण नामक वैश्य के साथ कर दिया गया कृष्ण की जो माता यशोदा थी रायाण उनका सगा भाई था.
– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 49/39,41,49
यदि राधा को कृष्ण के अंग से उत्पन्न माने तो वह उसकी पुत्री हुई . यदि यशोदा के नाते विचार करें तो वह कृष्ण की मामी हुई. दोनों ही दृष्टियो से राधा का कृष्ण के साथ प्रेम अनुचित था और कृष्ण ने अनेको बार राधा के साथ सम्भोग किया था ( ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय 15) और यहाँ तक विवाह भी कर लिया था (ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, 115/86-88).
इन सभी बातों पर अगर गौर किया जाये तो आप पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि कृष्ण भगवान् कहलाने का कितना अधिकारी है? भागवत गीता के बारे जो कथा प्रचलित है वो भी मात्र झूठ ही है। भागवत गीता भी मूल निवासियों को धर्म की गुलामी में फंसाए रखने का एक षड्यंत्र मात्र है। जो एक आर्य ऋषि व्यास ने लिखा था जिस में अच्छी बातें सिर्फ इस लिए लिखी गई ताकि मूल निवासी शक ना करे और ब्राह्मणों के धर्म जाल में फंसे रहे।
महाभारत के नाम पर भी मूल निवासियों को सिर्फ झूठ ही बताया गया है। ना कभी महाभारत का युद्ध हुआ और ना ही गीता युद्ध में कृष्ण ने बोली। यह तो कृष्ण को भगवान् को साबित करने का एक षड्यंत्र मात्र है।

9. बुद्ध अवतार: इस अवतार के बारे तो सारी दुनिया जानती है। बुद्ध काल तक सारे भगवान् और अवतार बलि के नाम पर मांस और खून के प्यासे थे, वो बुद्ध जैसे महान कैसे हो सकते है? बुद्ध शाक्य वंश में पैदा हुआ एक महान मानव था,(शाक्य वंश के बारे विस्तृत जानकारी आप को हमारे आने वाले लेखों में मिलेगी) जिसने ब्राह्मणों के विरुद्ध मूल निवासियों का एक धर्म बनाया और सभी मूल निवासियों को इकठ्ठा किया। मूल निवासियों का यह धर्म बौद्ध धर्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सिद्धार्थ बुद्ध के समय इस धर्म में कोई जाति व्यवस्था नहीं थी। सभी लोग एक सम्मान थे। कोई उंच-नीच नहीं थी। यहाँ तक सिद्धार्थ बुद्ध खुद भी जमीन पर बैठ कर प्रवचन दिया करते थे। यह धर्म कितना महान था इस बात का पता यही से लग जाता है कि 500 ईसवी से 700 ईसवी के बीच बौद्ध धर्म भारत का सर्व श्रेष्ट धर्म बन चूका था। ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त सा हो गया था। भारत में सभी लोग उंच-नीच, जाति-पाति भूलाकर सिर्फ इंसान बनकर रहने लगे थे। कोई भी मूल निवासी ब्राह्मणों को महत्व नहीं देता था और सारे मूल निवासी फिर से रूद्र काल के गौरव को प्राप्त करने के गौरव की और बढ़ रहे थे। इस बात से यूरेशियन आर्यों अर्थात ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई। बौद्ध धर्म को समाप्त करने के लिए फिर से सारे ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य एक हुए और उन्होंने एक चाल चली। बहुत से ब्राह्मण बौद्ध भिक्षु बन गए। बौद्ध धर्म के मत्वपूर्ण टिकानों पर ब्राह्मण बौद्ध भिक्षुयों ने कब्ज़ा कर लिया और राजपूतों ने बौद्ध भिक्षुयों के मठों पर आक्रमण कर दिया। लाखों बौद्ध भिक्षु मारे गए, बौद्ध भिक्षुयों के लिखे ग्रंथ और किताबें जला दी गई। बौद्ध धर्म को पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया। जो बौद्ध भिक्षु बचे वो अपने प्राणों की रक्षा के लिए भाग गए और जंगलों और पहाड़ों में चुप गए। आज फिर से बौद्ध धर्म लोगों के बीच प्रचलित हो रहा है परन्तु आज बौद्ध धर्म में भी उंच-नीच आ गई है। हीनयान ऊँचे माने जाते है और बाकि दोनों संप्रदाय नीच माने जाते है।
अब पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि महात्मा बुद्ध विष्णु का अवतार कैसे हो सकते है? जिन ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों ने बुद्ध धर्म का नाश कर दिया, आज उन्ही यूरेशियन आर्यों को शर्म तक नहीं आती।

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17 Responses to Avtaro Ka Sach

  1. a6a prayas hai

  2. arun says:

    ‘उस राधा का विवाह रायाण नामक वैश्य के साथ कर दिया गया कृष्ण की जो माता यशोदा थी रायाण उनका सगा भाई था.
    Radha ka vivah rayan naam k vaishya se kya antarjatiya vivah hote the us samay aur yashoda kis varna se aati thi
    please make me understand

  3. नरेन says:

    Boli gand admi Arya ke sare raja tai darte the ki falana raja saktisali tha, aryo ne use dokhe se mara

  4. rakesh says:

    vakbas hai sab

  5. Chander shakher azaad says:

    Peace is in you; Not any place .
    so why you go any other place like – 4 Dhaam

    ANSWER-
    lord bouddha says kahi kuch nahi bouddh ji ne pure
    asia ka chakr lagya ,kahi kuch nahi milana sur na asur na devi na devta
    to matlab hai ke santi aapke ander hai na ke kahi or

  6. Sanukumar says:

    Sahi

  7. रविराय पुरोहीत says:

    Jai Bheem

  8. ashu says:

    Jai Bheem

  9. Pingback: गौतम बुद्ध और थेरवादी नवबौद्ध ⇄ हिंदुत्व का अभिशाप या थेरवाद (हीनयान) वहाबियत के नये जिहादी ..? जिज

  10. Nishant says:

    मुझे लगता हैं की, अगर में सही हूँ तो मत्स्य अवतार वाले भाग में आपने ‘आर्य’ की जगह ‘मोगल’ शब्द का प्रयोग किया हैं|

  11. Ram bachan paswan says:

    सर आप की सभी पुस्तक सर आपकी सारी पुस्तक हमें चाहिए किस तरह मिलेगा और कितने पैसे लगेंगे आपके प्यार में बताने की कष्ट करें क्योंकि हम बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के बहुत बड़े फैन हैं हम उनकी विचारधारा पर चलने वाले व्यक्ति हैं इसलिए कृपया करके आप अपनी सारी पुस्तक हमें देने की कष्ट करें मेरा मोबाइल नंबर है 8822273828 /8474878628

  12. kulvinder singh says:

    avtraon ka sach sachmuch me sach hae

  13. Bheem Naraya Gautam says:

    Bharat ka itihas Janata tak pahunchane ke liye aapako bahut bahut saduvad namo buddhay Jay bheem

  14. harshad* says:

    Nice

  15. sk says:

    thanks

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