Truth About Casteism


ऋगवेद के सूत्र 10/९0 में चतुर वर्ण का उल्लेख किया गया है, जिसमें ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण का जन्म हुआ, दोनों हाथों से क्षत्रिय का, जांघों से वैश्य का तथा दोनों पैरों से शूद्र का जन्म हुआ। यही चतुर वर्ण जातियों का जन्मदाता है क्योंके वर्ण के आधार पर ही जातियों का वर्गीकरण हुआ या यूं कहें कि सभी जातियों को चार समूहों में बांट दिया गया, लेकिन इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्राह्मण वर्ण में केवल एक ही जाति ब्राह्मण है, जबकि दूसरे वर्णों में सात हजार से अधिक जातियां हैं। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य ब्राह्मण जाति को श्रेष्ठ स्थान दिलाना था। वर्ण व्यवस्था को न्यायोचित ठहराने के लिए कहा जाता है कि यह वर्ण पहले कर्म के आधार पर बनाए गए थे। यह एक कोरी मनोवैज्ञानिक दलील है क्योंकि वर्ण बनाए जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि हमारे से अनेकों देश जो सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक तौर पर अधिक संपन्न होते हुए भी उनमें इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं अर्थात् यही प्रथा हमारे पिछड़ेपन का कारण भी है।हिंदू धर्म शास्त्र वर्ण व्यवस्था के तहत ही जातियों का गान करते हैं। ambedkar3महाभारत शास्त्र के अनुसार जब एकलव्य नाम के एक जनजातीय बालक ने गुरू द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या में शिक्षा लेनी चाही तो उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया कि वह क्षत्रिय नहीं है, बल्कि जनजातीय अर्थात शूद्र वर्ण का है। इस पर बालक एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य को मन ही मन अपना गुरू मान लिया और उसकी प्रतिमा स्थापित करके उसी के आशीर्वाद से अपना अभ्यास शुरू कर दिया और वह एक दिन धनुर्विद्या में इतना निपुण हो गया कि कुत्ते की आवाज की तरफ उसने अपने बाण छोड़े और कुत्ते के पूरे मुंह को बाणों से बींध दिया, जिससे उसका भौंकना बंद हो गया। इतिफाक से जब द्रोणाचार्य अचानक उधर से गुजरे तो उन्होंने मालूम किया कि यह धनुषधारी कौन था। इस पर एकलव्य प्रकट हुआ और उसने गुरू द्रोणाचार्य को गुरू दक्षिणा देनी चाही तो इसके बदले में गुरू द्रोणाचार्य ने उसके दायें हाथ के अंगूठे को गुरू दक्षिणा के रूप में ले लिया। इससे स्पष्ट है कि उस संत के दिल में शूद्रो के प्रति गहरी नफरत थी और उसने आशीर्वाद देने की बजाय निर्ममता से एकलव्य का अंग-भंग कर दिया। यह था जातिवाद का एक घिनौना प्रदर्शन। धर्मग्रंथ रामायण में लिखा है कि उत्तराखंड में एक दलित शंबुक नाम के बालक ने 12 वर्ष तक एक पेड़ पर उल्टा लटककर तपस्या की तो उसी समय वहां एक ब्राह्मण बालक का देहांत हो गया, जिसका पिताजी जीवित था। इस घटना का इल्जाम शंबुक पर लगाया गया कि उसने दलित होते हुए तपस्या की, जिस कारण ब्राह्मण बालक का देहांत हो गया। इस बात की शिकायत ब्राह्मण बालक के साथियों ने मर्यादा पुरूषोत्तम राम से की, जिन्होंने वहां जाकर उस शूद्र बालक शंबुक की गर्दन धड़ से अलग कर दी। यह था मर्यादा पुरूष राम का दलितों के प्रति व्यवहार और अंधविश्वास भी। धर्मशास्त्र गीता में भगवान श्रीेकृष्ण कहते हैं कि यह चार प्रकार की वर्ण व्यवस्था उन्होंने ही योग्यता एवं काम के आधार पर तैयार की थी, लेकिन लोगों ने महाभारत में कृष्ण जी के द्वारा क्षत्रिय का कार्य करते हुए सुदर्शन चक्र चलाया लेकिन लोगों ने उन्हें अहीर अथवा यादव जाति का माना तथा गाय चराने वाले एक ग्वाले का दर्जा ही दिया। कुछ प्राचीन मुस्लिम लेखकों ने उन्हें शूद्र जाति का जाट माना है। क्या यह संभव नहीं था कि जिन्होंने स्वयं वर्ण व्यवस्था की रचना की और महान क्षत्रिय कार्य किया, फिर भी उनको क्षत्रिय तथा ब्राह्मण का दर्जा नहीं दिया गया क्योंकि वे जाति के यादव थे। मद्रास रा��
�्य(तमिलनाडू) में ताड़ी निकालने वालों को ब्राह्मण जाति की शाखा माना गया, लेकिन ब्राह्मणों से बात करने के लिए उन्हें 24 कदम दूर रहने को कहा गया। नायक जाति के लोगों को, जोकि खेतीहर किसान हैं, नमूदरी ब्राह्मण के पैर छूने का अधिकार नहीं था। केवल दूर से ही बात कर सकते थे। तायन जाति के लोगों को ब्राह्मणों से 36 कदम दूर से बात करने को कहा गया, लेकिन इससे भी बढक़र पुलायन जाति के लोगों को ब्राह्मण से 96 कदम दूर से बात करने को कहा गया। वहीं दूसरी ओर तायन जाति के लोगों को नायक जाति के लोगों से 12 कदम दूर से बात करने को कहा गया। इस प्रकार इस वर्ण व्यवस्था ने एक इंसान को दूसरे इंसान से बिल्कुल अलग कर दिया।महाराष्ट्र में महार जाति के लोगों को रास्ते पर कहीं भी थूकने की मनाही थी और इसके लिए उनको अपने गले में कोई बर्तन टांगकर रखना पड़ता था। यदि रास्ते में किसी ब्राह्मण का आना होता तो उन्हें अपने पद्चिन्हों को मिटाने के लिए उन्हें अपनी कमर से झाडू बांधकर रखनी पड़ती थी। किसी भी दलित की ब्राह्मण पर छाया पडऩा अपराध था। यह सब वर्ण व्यवस्था की करामात थी। तीनीविली जिले में पुरादा समूह के लोगों को दिन के समय बाहर निकलने का अधिकार नहीं था क्योंकि उनके देखने से ही वातावरण को दूषित होना समझा जाता था। इसीलिए इन बेचारों को सारे कार्य रात में ही करने पड़ते थे अर्थात् उनको सूर्य के दर्शन करने का भी अधिकार नहीं था। मैसूर राज्य में दलित और छोटी जातियों की औरतों को अपनी छाती ढंकने का अधिकार नहीं था और न ही वे उच्च जातियों की स्त्रियों के समान बाल संवार सकती थीं और न ही सुनहरी गोटेदार किनारी लगे कपड़ों को पहन सकती थी। यह था इंसान का इंसान के प्रति धर्म।इतिहास में चाणक्य उर्फ कौटिल्य की बड़ी प्रशंसा की जाती है। लेकिन उनके द्वारा बनाए गए कानून पूरी तरह जातिवादी थे क्योंकि सभी ब्राह्मणों को करमुक्त कर दिया गया था। क्षत्रियों को तीन प्रतिशत कर, वैश्य को चार प्रतिशत तथा शूद्रों को पांच प्रतिशत कर के रूप में देना पड़ता था। अर्थात् सबसे गरीब शूद्र को सबसे अधिक कर देना पड़ता था। यही थी चाणक्य की न्याय प्रणाली। सातवीं शताब्दी में सिंध के आलौर रियायत पर सियासी राय मोर गौत्र के जाट का राज्य था। लेकिन चच नाम के ब्राह्मण ने षड्यंत्र के तहत उसका राज्य हथिया लिया और जिस प्रकार की पाबंदियों का ऊपर वर्णन किया गया है, ऐसी पाबंदियां जाटों पर लगाई गईं तथा चचनामे में जाटों को चांडाल जाति लिखा है। (अन्य धर्मशास्त्रों के अनुसार)मनुस्मृति(100) : पृथ्वी पर जो है, वह सब ब्राह्मण का है। मनुस्मृति(101) : दूसरे लोग ब्राह्मणों की दया के कारण पदार्थों का भोग करते हैं। मनुस्मृति(127) : ब्राह्मण तीनों वर्णों से बलपूर्वक धन छीन सकता है। मनुस्मृति(165-66) : जान-बूझकर क्रोध से भी ब्राह्मण को तिनके से जो मारता है, तो 21 जन्मों तक वह बिल्ली की योनि में जन्म लेता है। मनुस्मृति(64) : अछूत जातियों के छूने पर स्नान करना चाहिए। मनुस्मृति(8, 21 व 22) : ब्राह्मण चाहे अयोग्य भी हो, उसे न्यायाधीश बनाना चाहिए। मनुस्मृति(8, 267) : यदि कोई ब्राह्ण को दुर्वचन कहेगा तो भी वह मृत्यु का अधिकारी है। मनुस्मृति 270) : यदि कोई ब्राह्मण पर आक्षेप करे तो उसकी जीभ काटकर दंड दें। शतपथ ब्राह्मण : यदि किसी की भी हत्या होती है, तो वास्तविक हत्या ब्राह्मण की मानी जाएगी। यदि कोई ब्राह्मण शूद्र की हत्या करता है तो वह किसी बिल्ली, चूहे, मेंढक, छिपकली, उल्लू व कौए के समान मानी जाएगी। किसी राजा को ब्राह्मण को सजा देने का अधिकार नहीं है। ब्राह्मण की हत्या से बड़ा कोई अपराध नहीं है। गौतम धर्म सूत्र : यदि शूद्र किसी वेद को सुन ले तो उसके कान में पिछला हुआ सीसा या लाख भर देनी चाहिए। बृहद्हरित स्मृति : बौद्ध भिक्षु तथा मुंडे हुए सिर वालों को देखने की मनाही है। सत्यार्थ प्रकाश(पेज नंबर 20, 53, 54, 60, 76 तथा 184) स्वामी दयानंद को एक महान समाज सुधारक माना गया है और उन्होंने मूर्ति पूजा का खंडन करके एक महान कार्य किया। लेकिन वर्ण व्यवस्था से वे भी अपना पीछा नहीं छुड़वा पाए। उन्होंने दलितों को जनेऊ पहनने तथा वेद सुनने का अधिकार तो दिया, लेकिन उनसे पका हुआ भोजन लेने से मना किया। पुनर्विवाह के बारे में उन्होंने लिखा है कि ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय की लडक़ी विधवा हो जाती है और उसका संयोग नहीं हुआ है तो उसका पुनर्विवाह कर देना चाहिए, अन्यथा नहीं। लेकिन शूद्र संयोग होने पर भी बेटी का पुनर्विवाह कर सकता है। स्वामी जी ने संत कबीर, गुरू नानक जी तथा संत रामदास की बुराई करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पुस्तक मुसलमानों की सियासत ( लेखक इलियास आजमी, पूर्व सांसद) : जब 1946 के अंत में यह स्पष्ट हो गया था कि अंग्रेज भारत छोडऩे वाले हैं, तो देश के 15 राज्यों के कांग्रेस कमेटियों ने भारत का प्रथम प्रधानमंत्री चुनने के लिए सरदार पटेल का समर्थन किया, लेकिन पंडित नेहरू, गांधी व दूसरे उच्च जातियों के लोग किसी दलित या पिछड़ी जाति का प्रधानमंत्री बनाने के हक में नहीं थे। इसलिए पंडित नेहरू ने एक चाल चली कि कांगे्रस के अध्यक्ष श्री अब्दुल कलाम आजाद से जबरन त्यागपत्र लिया गया तथा इसी प्रकार देश के सभी 15 राज्यों के कांग्रेस अध्यक्षो से भी त्यागपत्र लिया गया। लेकिन बंबई प्रदेश के तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्री नरीमान, जो पारसी थे, ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने से इंकार किया तो उन्हें इतना अपमानित किया गया कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी(बंबई में इनकी याद में नरीमन प्वायंट है, जहां पर 26 नवंबर, 2008 को पाकिस्तानी उग्रवादियों ने हमला बोला था)। इस प्रकार सभी राज्यों में पंडित नेहरू ने ब्राह्मण जाति से कांग्रेस के अध्यक्ष तैनात कर दिए और देश आजाद होने पर उन्हीं अध्यक्षों को भारत का पहला आम चुनाव(1952) होने तक मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिए गए। देश का विभाजन होने पर जितने भी मुस्लिम अधिकारी पाकिस्तान गए, उनके स्थान पर ब्राह्मण जाति से अधिकारी नियुक्त करने के लिए अपने सजातीय मुख्यमंत्रियों को गोपनीय पत्र लिखा। इसी प्रकार आजाद भारत में पंडित नेहरू ने जाति प्रथा को और मजबूत कर दिया। लेखक : यह जाति प्रथा भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों, जैसे कि मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, मणीपुर व अरूणाचल, जो सभी जनजाति बाहुल्य है, को भी प्रभावित किए बगैर नहीं रह सकी। इन राज्यों में आज तक कभी छूआछूत नहीं रही, लेकिन जातीय प्रथा पूर्णरूप से उभरकर सामने आई, जैसे कि मिजो जाति के लोगों ने रियांग जाति के लोगों को मिजोरम से पूर्णतया भगा दिया और वे आज त्रिपुरा में शरणार्थी जीवन बिता रहे हैं। इसी प्रकार में चकमा और बोम जातियां सुरक्षा बलों के संरक्षण में जी रही हैं। मणीपुर में वर्तमान में 34 उग्रवादी संगठन हिंदू और ईसाई जातीय आधार पर काम कर रहे हैं। नागालैंड की नागा जाति को एक नस्ल कहा जाता है, लेकिन इनमें भी 16 जातियां हैं, जिनको उनके पहनावे से पहचाना जा सकता है। इसी प्रकार अरूणाचल में 150 से अधिक जनजातियां हैं। मेघालय राज्य में खासी और जयंती जातियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं।इस प्रकार हम देखते हैं कि आज भी हमारे पूरे देश में जाति प्रथा कायम है और पूरे भारत वर्ष में कोई भी ऐसी जाति नहीं है, जिसका अपना जातीय संगठन न हो। पूरे देश में जाति के आधार पर स्कूल, कॉलेज, धर्मशालाएं व अन्य संस्थाएं बनी हुई हैं, जिनके समारोह में नेता लोग मुख्यातिथि के तौर पर सम्मिलित होकर इस प्रथा को और भी बलशाली बना रहे हैं। सभी राजनीतिक पार्टियां जातीय आधार पर टिकट बांटती हैं और मंत्री बनाती हैं। कुछ लोगों को गलतफहमी है कि प्रेम विवाह से जातीय प्रथा समाप्त हो जाएगी। हमें याद रखना चाहिए कि हजारों साल पहले सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की बेटी कार्नेलिया उर्फ हेलन चंद्रगुप्त मौर्य से प्रेमविवाह किया था और उसके बाद भी प्रेम विवाह होते रहे हैंं। भारतीय संविधान बनने के समय दबे कुचले लोगों का सामाजिक स्तर उठाने के लिए इन्हीं चार वर्णों के लोगों को चार समूहों में बांट दिया गया, जैसे कि अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा और सामान्य अर्थात उच्च जाति। लेकिन जाति प्रथा अपने पूरे शवाब पर आज भी भारतवर्ष में कायम हैं !

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