Brahmanvaad aur Deravaad


एक लंबा युद्ध जो सिंधुघाटी के मूल निवासी लोगों और विदेशी आर्य/ब्राह्मणों के बीच चला और इसी दौरान वेद, शास्त्र, श्रुति, गीता, रामायण, पुराण, मनुस्मृति का जन्म हुआ। हिन्दु धर्म की इन सभी पुस्तकों में मूलनिवासी लोगों को शूद्र और अतिनीच का दर्जा दिया गया। आर्य ओर ब्राह्मणों की दाद देनी बनती है जिन्होंने कुकर्म भी किए, ज़ुलम भी किए, कत्लेआम भी किए , मनुष्य को लताड़ा और फिर भी पवित्र के पवित्र रहे। यह सब किस के लिए? सिर्फ खुद को सुरक्षित रखने के लिए, धन-दौलत के लिए और मुफ्त का खाने के लिए। ठंडे देशों से आए विदेशी आर्यों ने बहुजन मूलनिवासीयों की सभ्यता को ख़त्म करने में कामयाबी प्राप्त कर ली, यह किसके कारण संभव हो सका? सिर्फ धर्म के कारण। ऊट-पटाँग कर्माकाण्ड को धर्म का नाम देकर लोगों को मानसिक रूप में गुलाम बना लिया गया और वह शारीरिक रूप में खुद ही गुलाम बन गए। भारत के लोग आज भी ब्राह्मणों की धार्मिक गुलामी के मानसिक रूप से इतने गुलाम बन गए हैं कि इस गुलामी से निकलने का नाम ही नहीं ले रहें। आज इसी ब्राह्मणवादी मानसिकता ने धर्म को एक बिजन्स बना कर भारत को बाकी देशों से पिछाड़ दिया है। धर्म के नाम पर लूटने वाले ब्राह्मणवादी भगवान से जोड़ने वाले अस्थान भारत के चप्पे-चप्पे पर मौजूद हैं, इन्हें हम बड़े प्यार से डेरे कहते हैं। हरेक किलोमीटर पर बने हुए यह अलग-अलग डेरों का प्रमात्मा तक पहुंचने का, मनुष्य की मुक्ती का, ज़ाति-बरादरी की मुक्ति का, रस्ता अलग अलग है। पर ब्रह्मणवादी मानसिक्ता सभी की एक जैसी ही है।

brahmanvaad - deravaadजो डेरे या धार्मिक संस्था चला ही उच्च वर्ग रहा है वे तो ब्रह्मणवाद का प्रचार प्रत्यक्ष रूप से करते हैं लेकिन जो डेरे मूलनिवासीयों के साथ जुड़े हुए हैं वो अप्रत्यक्ष तौर ब्रह्मणवाद का प्रचार करते हैं और सीधे इसलिए नहीं करते क्योंकि हमारे दलित रहबरों की विचारधारा उनके रस्ते का रोड़ा बनकर खड़ी हो जाती है पर हमारे मूलनिवासीयों ने भी करना तो ब्रह्मणवाद का ही प्रचार होता है पर थोड़ी सी यू-टर्न लेकर। यह ब्रह्मणवादी मानसिकता ब्राह्मणों से निकलकर हमारे समाज में कब और कैसे आई हम पहले इसका वर्णन करते हैं फिर ही हम यह समझेंगे कि गुरू रविदास जी के बेग़मपुरे वाली सोच से यह डेरे और डेरों के संचालक कैसे भिन्न हैं। जिसके कारण भारत दिनों-दिन पिछड़ता जा रहा है और ब्राह्मणवादी या हिंदूवादी मानसिकता से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा। ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में सिर्फ इतना अंतर है कि ब्राह्मण वो मनुष्य है जो सिर्फ ब्राह्मण के घऱ जन्म लेता है और ब्राह्मणवादी मानसिकता ऐसी मानसिकता है जिसको हम सभी ने धारण कर रखा है।

किसी दूसरी जाति या वर्ण के आदमी के लिए ब्राह्मण बनना कितना मुश्किल था आप इस घटना से अंदाज़ा लगा सकतें हैं, एक बार क्या हुआ कि एक अंग्रेज़ गोरा काँशी बनारस पहुंचा हआ था उसने हिंदू धर्म के बाहरी रीती-रिवाज़ देखते हुए काँशी के एक ब्राह्मण से प्राथना की कि वह ब्राह्मण बनना चाहता है इसलिए उसे क्या करना होगा? क्योंकि वह ब्राह्मण की उच्चता को समझ चुका ता वो हिन्दू धर्म में श्रद्धा भी रखता था पर वो ब्राह्मण ही बनना चाहता था। तो उसको ब्राह्मण ने कहा कि तुझे 100 यज्ञ करवाने होगें, एक किलो सोना किसी ब्राह्मण को दान देना होगा और अपना सभी धन-दौलत और घर-बार आदि ब्राह्मण को दान करना पड़ेगा। इतना सुनकर वो गोरा अंग्रेज़ बोला फिर मैं ब्राह्मण तो बन जाऊँगा ना। उस ब्राह्मण ने कहा, इतना सब कुछ करने बाद तूँ ब्राह्मण तो बन जाएगा लेकिन इस जन्म में नहीँ अगले जन्म में। तूँ ऐसे करना कि इतना सब कुछ करने के बाद गंगा के किनारे पर जाकर अपने मन में यह इच्छा धार कर कि मेरा अगला जन्म किसी ब्राह्मण के घर हो, तुम पानी में कूदकर अपनी जान दे दो फिर अगले जन्म में तुम अवश्य ही ब्राह्मण के घर जन्म ले लोगे। यह सुनकर गोरा अंग्रेज़ वहाँ से रफू-चक्कर हो गया। इस तरह आप देख सकते हैं कि एक ग़ैर-ब्राह्मण का ब्राह्मण बनना कितना मुश्किल है।

मनुस्मृति (1, 99,100) की गवाही है कि ब्राह्मण जन्म से ही सारे संसार में सर्वश्रेष्ट है। वह सारे प्राणीयों का ईश्वर है और सारे खज़ाने का रक्षक भी। इस संसार में जो भी सम्पती है, वह ब्राह्मण की निजी है। ब्राह्मण चाहे मुफ्त खाए, पराए वस्त्र पहने, पराए धन को मुफ्त में ले, तब भी सभी प्राणी उसके रिणी हैं क्योंकि सारे जीव ब्राह्मण की दया से जीवत हैं। भगवत गीता (4-13) ने भी हद्द कर दी है, लिखा है सृजणहार ने मनुष्य की जन्म से ही योगताएँ और बल के आधार पर चार वर्णों के कर्तव्य और काम बाँट दिए हैं। देखा जाए तो दलित समाज की गुलामी के असली बीज हिन्दु धर्म की इन्हीं धार्मिक पुस्तकों में ही बीज दिए गए जो कि बहुत बड़ा पेड़ बनकर दलित समाज की छाती पर आज भी खड़ा है। इस लिए मनुस्मृति में दर्ज है- ”फालतु दलीलबाजी छोड़ कर वेदों और श्रुतियों के पीछे लगना चाहीए।” ऋग्वेद में सिर्फ चार वरणों का वर्णन किया गया है और चमार को शूद्र वर्ण में दर्ज किया गया है पाँचवां वर्ण भाव अतिनीच वर्ग 300-400 ई. के अंतर्गत पैदा हो चुका था। यह छुआ-छूत सतिगुरु नामदेव, सतिगुरु कबीर,सतिगुरू रविदास जी के सम्य में अपनी चर्मसीमा पर पहुंच चुकी थी। उस समय शूद्र/नीच/अतिनीच समझी जाती चमार जाती में पैदा हुए गुरू रविदास जी ने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध उच्चकोटि का उपदेश देते हुए फ़रमाया-

बेग़मपुरा सहर को नाउ।। दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ।।
नां तसवीस खिराजु न मालु।। खउफु न खता न तरसु जवालु।। रहाउ।।
काइमु दाइमु सदा पातिसाही।। दोम न सेम एक सो आही।।
आबादानु सदा मसहूर।। ऊहां गनी बसहि मामूर।। 2।।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै।। महरम महल न को अटकावै।।
कहि रविदास खलास चमारा।। जो हम सहरी सु मीतु हमारा।। 3।। 2।।

देखो, कितनी बड़ी बात है कि इस शब्द की विचारधारा यू. ऐन. ओ. की मुख्य धरा से हुबहु मेल खाती हैं, उनमें से मुख्य हैं-

– सभी मनुष्य जन्म से आज़ाद हैं और ग़ैरत के अधिकारों में सभी एक समान है।

– हर कोई सभी प्रकार के अधिकारों के नस्ल, रंग, लिंग, भाशा, धर्म, राजनीतिक या ओर विचारां, कौमी या समाजक पछौकड़, ज़मीन, जन्म या किसी भी ओर हैसीयत में कोई भी बिना किसी फर्क से हक्कदार है।

– हर मनुष्य को आज़ादी, ज़िन्दगी और निजी सुरक्षा का अधिकार है।

– किसी से भी गुलामी और चाकरी नहीं करवाई जाएगी।

– हरेक को अपने देश में घुमनें-फिरने की आज़ादी है, रहाईश का हक्क है।

– हर किसी को किसी की दखल-अंदाजी के बिना अपने विचार रखने का अधिकार है।

– हर किसी को बराबर की तनख़ाह, मनमर्जी का रुज़गार चुनने, काम के दौरान आराम का बराबर अधिकार है।

– हर किसी को इक समान नागरिकता का अधिकार है।

इसी बेग़मपुरे के संक्लप को बाकी के संत-गुरुओं ने भी अपनाया। मुस्लमानों के आने से ब्राह्ममणवाद की जकड़ ढीली हुई और संत-गुरुओं को अपने विचार बुलंद आवाज़ में कहने का मौका मिला। उन्होंने ब्राह्मण की उच्चता को निकारा और ब्राह्मण के मुकाबले एक ऐसे चरित्र का निर्माण किया जो ब्राह्मण से भी ऊँचा था, संत था, भगत था, गुरू था। एक तर्फ तुलसीदास और ऊसके बाद आए ब्राह्मणवादी कवि जैसे संत नाभा दास, संत आनंत दास, संत प्रिया दास आदि ने शूद्र संत-गुरूयों को नीचा दिखाना शुरू कर दिया और अपनी बाणी में इनकी आलोचना करनी शुरू कर दी। दूसरी तरफ पंजाब के गुरू साहिबान ने इन संतों की विचारधारा को अपनाते हुए संत की महिमा का गाईन शुरू कर दिया-

उआ अउसर कै हउ बलि जाई।। आठ पहर अपना प्रभु सिमरनु वडभागी हरि पांई।।1।। रहाउ।। भलो कबीरु दासु दासन को ऊतमु सैनु जनु नाई।। ऊच ते ऊच नामदेउ समदरसी रविदास ठाकुर बणि आई।।1।। जीउ पिंडु तनु धनु साधन का इहु मनु संत रेनाई।। संत प्रतापि भरम सभि नासे नानक मिले गुसाई।।2।।4।।5।। (गुरू अरजन देव, पृष्ठ 1208)।

इसके साथ साथ कर्मों के चक्रव्यु में फंसे, ज़ात-पात, भेद-भाव, ऊच-नीच में फसे हुए ब्राह्मण पंडित की संतों ने और गुरू साहिबान ने निंदा की, जिससे उसकी उच्चता का लेबल गिर गिया, नीचे कुछ उदाहर्ण देखें-

जिह मुख बेदु गाइत्री निकसै सो किउ ब्रह्मनु बिसरु करै।।

जौ तूं ब्रह्मणु ब्राह्मणी जाइआ।। तउ आन बाट काहे नही आइआ।।

तूं ब्राहमनु मै कासीक जुलहा मुहि तोहि बराबरी कैसे कै बनहि।।
हमरे राम नाम कहि उबरे बेद भरोसे पांडे डूबि मरहि।। (संत कबीर साहिब)

पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि आउरु न कोइ।। (गुरु रविदास जी)

मूरख पंडित हिकमति हुजति संजै करहि पिआरु।।
धऱमी धऱमु करहि गावावहि मंगहि मोख दुआरु।। (गुरू नानक देव जी)

पंडित वाचहि पोथीआ ना बूझहि वीचारु।।
अन कउ मती दे चलहि माइआ का वापारु।।(गुरू नानक देव जी)

ऐसे गुरबाणी के कई प्रमाणिक तत्थ हैं जिस से समकाली ब्राह्मण का असली और घिनौणा चेहरा सब के सामने आता था। ब्राह्मण की उच्चता को नकार संत-गुरू साहिबान ने किसकी उच्चता को प्रमाणिकता दी, ब्राह्मण के मुकाबले पाक-पवित्र थे संत-साध-भगत-ब्रह्मगिआनी-गुरू-सतिगुरू (सभी के सभी शुद्र जाति से संबंध रखने वाले)।

अब बात करते हैं आज के संतों की आज के साधुओं की जिन्होंने बेग़मपुरे वाली विचारधारा तो अपनाई नहीं बल्कि उलटा ब्राह्मण की तरह अपने आपको उचां साबित करने के लिए संत-साध-सतिगुरू बन कर बैठ गए हैं। क्योंकि ब्राह्मण से ऊचीं ऊपाधी अब संत-साध-सतिगुरू की हो गई है गुरुबाणी के प्रभाव के कारण। जिस ब्राह्मणवादी विचारधारा के खिलाफ बेग़मपुरे वाली विचारधारा खड़ी की थी, उसको तो आज के संतों ने अपनाया नहीं क्योंकि विचारधारा किसी ने समझी नहीँ। इसीलिए ब्राह्मणवाद ज्यों का त्यों ही रहा। इन संतों ने हमारे अछूत दलित संत जैसे सतिगुरू कबीर, सतिगुरू नामदेव, सतिगुरू रविदास आदि की विचारधारा को ख़त्म कर दिया। आज के युग के ब्राह्मणवादी संतों के कारण देश के हालात इतने खराब हो गए हैं कि अब शायद ही इस देश से ब्रह्मणवाद ख़त्म कर बेग़मपुरा स्थापित किया जा सके। जो कुछ पहले ब्रह्मण करता था वही अब आज का संत-गुरू-साध कर रहा है अब मनुस्मृति (1, 99,100) की गवाही को इस प्रकार पढ़ा जा सकता है कि ब्राह्मण (संत-साध-सतिगुरु) जन्म से ही सारे संसार में सर्वश्रेष्ट है। वह सारे (संत-साध-सतिगुरु) प्राणीयों का ईश्वर है और सारे खज़ाने का रक्षक भी। इस संसार में जो भी सम्पती है, वह ब्राह्मण (संत-साध-सतिगुरु) की निजी है। ब्राह्मण (संत-साध-सतिगुरु) चाहे मुफ्त खाए, पराए वस्तर पहने, पराए धन को मुफ्त में ले, तभ भी सभी प्राणी उसके रिणी हैं क्योंकि सारे जीव ब्राह्मण (संत-साध-सतिगुरु) की दया से जीवत हैं।

ब्राह्मण अपने आप को संसार का कर्ता-धर्ता मानता रहा और मुफ़्त का खाकर भी ऊसने आपना इतिहास पाक-पवित्र रखा। दूसरी तरफ अपना सब कुछ गवां चुके सिंधूघाटी के मूलनिवासी लोग अभी तक यह नहीं जान पाए कि उनकी असली पहचान क्या है? हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में हमें भद्दे नामों से पुकारा जाता रहा है जैसे आसुर, राक्षस, शूद्र, अछूत, ढेड, नीच, भंगी, चूहड़ा-चमार आदि नामों से हमें पुकारा गया। महात्मा गांधी ने तो हमें हरिजन कह कर गाली भी निकाल दी। यह थी ब्राह्मणवाद मानसिकता की हमारे प्रति घृणा से भरी एक झल्क। इसलिए बाबा साहिब डा. अम्बेडकर ने जहाँ तक हो सका दलितों का इतिहास निकाल कर लोगों के सामने रखा औऱ अपनी पुस्तक WHO WAS THE SHUDRA? में लिखा कि दलित असल में बोद्धी हैं। बुद्ध से पहिले दलितों का कौन सा धर्म था, मालूम नहीं पर हमें मूलनिवासी कहा कर हमेशा जाना जाता रहेगा भाव संसार की सबसे अमीर सभ्यता के असली वारिस।

मुझे लगता है धर्म का चक्रव्यु विदेशी आर्य ने ज़ात-पात की तरह फैलाया है। सारे कर्म-कांड ब्राह्मण जैसे ही बस नाम अलग-अलग। जिस तरह चार वर्ण और ज़ात-पात फैलाकर ब्राह्मण ने आपने आप को सुक्षित रखा ठीक उसी तरह धर्म का होहल्ला डालकर ब्राह्मण आपनी रोटी सेकता रहा। शूद्रों दलितों के लिए निकली हरेक आवाज़ को धर्म के नाम पर बंद करवा दिया गया। जहाँ तक हो सका मूलनिवासी लोगों को जु़ड़ने नहीं दिया गया ज़ात के नाम पर और धर्म के नाम पर इनको तोड़ा ही गया।

अब बात करतें हैं कि ब्राह्मणवाद ब्राह्मण से निकल कर हमारे दलितों में कैसे आया। जिसका कारण है- डेरावाद। ब्राह्मणों के डेरे तो ब्राह्मणवादी हैं ही, संतमत का दिखावा करने वाले दलितों के डेरे होने का दावा करने वाले डेरे भी ब्राह्मणवाद का ही प्रचार कर रहे हैं और गरीब जनता को लूट कर अपना पेट ही भर रहे हैं। यह भी दलितों को एक नहीं होने दे रहे। हम बात करने जा रहे हैं उन रविदासी डेरों की, जो पंजाब में बहुत गिनती में मौजूद है। जब पंजाब में सब से पहिले गाँवों में जात-पात की मानसिकता अधीन दो दो गुरूद्वारे बनने लगे थे, जिसमें एक सिक्खों का गुरद्वारा और दूसरा रविदासिया गुरद्वारा कहा जाने लगा , हमारे लोगों के साथ गुरद्वारों में भी भेद-भाव हुआ उन्होंने अपने अलग गुरद्वारे बना लिए। कुछ सिक्खों ने इस बात पर आपत्ती जताई की एक गाँव में दो गुरद्वारे नहीं होने चाहिए पर जब गाँव के मृत्युघर (श्मशानघाट) वाले स्थान एक करने की बात आई तो वो भी चुप्प कर गए। सतिगुरू रविदास जी ने अपनी बानी में साफ-साफ अपने आप को चमार लिखा है इसलिए सारी चमार जाती सीधे रूप से गुरू रविदास जी के नाम पर जुड़ गई। सिक्खों ने चमारों के गुरूघरों को रविदासिए गुरद्वारे कहना शुरू किया और जो चमार सिक्ख बनता था उसको वो रविदासीया सिक्ख के नाम से पुकारते थे। डॅा. अम्बेडकर की कृप्या से सभी दलित पढ़ने-लिखने लगे। पंजाब में दलितों में से चमार जाति पढ़ने-लिखने में सबसे आगे निकल गई और स्वाभाविक तौर पर वो गुरू रविदास जी से जुड़ गए। पहिली बार गुरू रविदास जी का आगमन दिवस इन्हीं चमारों ने मनाया था और फिर ही यह रीति आगे बड़ी। डा. अम्बेडकर ने जब अंग्रेज़ों से दलितों को अधिकार लेकर दिए कि कोई भी आदमी अब सीरी (मुफ्त में काम करने वाला) नहीं होगा या सिर्फ रोटी पर ही काम नहीं करेगा तो चमारों की हालत में सुधार तेज़ी से आना शुरू हो गया। चमारों ने अपने घरों को पक्का करना शुरू कर दिया। बहुत से चमारों के हिस्से पंजाब में मंड वाली ज़मीनें भी आई। बहुत से चमार नौकरीयों पर लग गए। ऐसे चमारों की हालत में सुधार आने की ही देर थी तो पंजाब में जितने उदासी संप्रदाए या भगवान श्रीचंद को मानने वाले डेरे थे वह बड़ी तेज़ी से सभी के सभी उदासी से रविदासीए बन गए। पंजाब में जितने भी रविदासीयों के उदासी डेरे हैं इन सभी की जड़ें बाबा श्रीचंद (गुरू नानक देव जी के सपुत्र) से जुड़ती हैं या फिर बाबा बालक नाथ या किसी ओर धुआधारी से। पर यह सच्च है कि यह सभी उदासी डेरे पहले श्रीचंदी के थे और अपने नाम के आगे 108 लगाकर अपना इष्ट/भगवान बाबा श्रीचंद को मानते थे क्योंकि बाबा श्रीचंद का झुकाव उदासीमत की तरफ था इसलिए गुरू नानक साहिब ने उसे अपनी गद्दी देकर नहीं गए। इसी बाबा श्रीचंद को पंजाब के सारे उदासी डेरे अपना आर्दश मानते थे और बाद में यह पंजाब के सभी उदासी डेरे रविदासिए बन गए। दुनिया से मोह तोड़कर उदासी बनकर लगभग सभी अछूत चमार ही इन्हीं डेरों में बैठे थे प्रमात्मा की भक्ती करने के लिए, चमारों की हालत में सुधार आते ही उन्होंने अपने डेरों को सीधे तौर पर जाति से जोड़ लिया। जो संत-साध लोगों को अपने नज़दीक नहीं आने देते थे वो चमारों के घरों में भर्मण करने लगे। पंजाब में चमारों की हालत सुधरने से शायद वो गुरू रविदास के नाम पर एकजुट हो जाते पर वो इन डेरों की वजह से नहीं जुड़ पाएँ क्योंकि इन डेरों के रस्ते भी अलग अलग थे जो आगे पढ़कर पता चलेगा। आगे चलकर सब कुछ साफ हो जाएगा कि कैसे इन्होंने ब्राह्मणवाद को अपने अंदर आज भी जिन्दा रखा है पर दिखावा यह अभी भी गुरू रविदास जी की विचारधारा पर चलने का करते हैं।

इन उदासी यां रविदासिए डेरों के इलावा पंजाब में हमारे लोगों का रुझान जिस डेरे में सबसे ज़यादा है वो है- राधा स्वामी सत्संग ब्यास। हिन्दुवादी डेरों की तरह इस डेरे का हाल ही ऐसा है कि दिखावा संतमत का और प्रचार ब्राह्मणवाद का। संतमत और ब्राह्मणवाद की खिचड़ी बनाकर यह डेरा लोगों के दिमागों में ब्राह्मणवाद भर रहा है, इसके इलावा इस डेरे का औऱ भी काम है जैसे कि ब्यास दरिया के किनारे की 1000 एकढ़ ज़मीन डेरा हढ़प कर चुका है, ब्यास दरिया का सारा मंड इलाका अब मंड सत्संग कहलाता है। अपने निजी हितों की राखी के लिए इस डेरे ने ब्यास दरिया का रुख ही मोड़ दिया है जिसके कारण दूसरी तरफ के लोग बहुत परेशान हुए हैं। आप सोचो जिस डेरे में एम. पी., सी. एम., आर. एस. एस. मुखी, भाजपा के नेता, कांग्रस के मंत्री खुद चलकर आए वह भला जनता को क्या मानता होगा जनता तो उसे ही मानेगी ना। राधा स्वामी सत्संग ब्यास में ब्राह्मणवाद को खुश करने के लिए तुल्सीदास जैसे कवियों (जिन्होंने शूद्र, औरत और पशु को एक समान का दर्जा दिया) की कविता उसी स्टेज से पढ़ी जाती है जिस स्टेज से गुरू नानक साहिब जैसे क्रांतिकारी रहबरों की बाणी पढ़ी जाती है। यानि कि खिचड़ी धर्म बनाकर राधा स्वामी ब्राह्मणवादीयों को खुश करने में लगा हुआ है। पाठकों ने राधा स्वामीयों को संतमत-संतमत करते हुए आम ही सुना होगा पर संत मत क्या है इन्हें खुद ही मालुम नहीं है। उन्होंने दलित रहबरों की बाणी में से नामदान जैसे कि- जोतिनिरंजन, ओंकार, रारंकार, सोहं, सतिनाम और इन्हीं संतों की बाणी से गुरु, शब्द, सतसंग आदि शब्दों का इस्तेमाल बिजन्स के रूप में किया है पर इन शब्दों की जो विचारधारा है उसके ऊपर यह खुद ही नहीं चले। राधा स्वामी जो नामदान देते हैं यह नामदान अछूत संतों की देन है पर उनकी विचारधारा को त्याग कर इन्होंने सिर्फ लफ्ज़ों को ही पकड़ रखा है विचारधारा इन्होंने गायब कर दी है। इन्होंने सिर्फ मुफ्त के दाम पर पुस्तकें बेचने पर ज़ोर दिया है, राधा स्वामी सत्संग ब्यास डेरा इतना बड़ा है कि मुझे लगता है इन्हें खुद नहीं मालूम होगा कि यह अपनी तरफ से कितना ब्राह्मणवाद फैला रहे हैं।

असल में संतमत और ब्राह्मणवाद की खिचड़ी का काम बाबा सावण सिंह के समय से शुरू हो चुका था। बाबा सावण सिंह ने अपनी लिखतों में हिन्दु धर्म को खुश करने के लिए गीता की उदाहरणें ऐसे दी हैं जैसे गीता सब दुखों को दूर करने वाली हो। जबकि दलितों की गुलामी के बीज गीता में स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसमें ज़रा भी शक्क की गुंजाइश नहीं है कि राधा स्वामी सत्संग ब्यास डेरा उच्ची जाति वालों को खुश करने के लिए दलितों के साथ धोखा करता आया है, इसीलिए बाबा सावण सिंह के समय से ही वहाँ लंगर दो जगह बाँटा जाता था दलितों को अलग पँगत में बिठाया जाता था और सर्वण जाति के लोगों को अलग पँगत में बैठा कर लंगर खिलाया जाता था। जबकि इस प्रथा का अंत हमारे गुरू साहिबान ने आज से कितने सौ साल पहिले ही कर दिया था। फिर यह कैसे वक्त के गुरू जो अपनी ही संगत से भेद-भाव करते है, वो भी आज के विज्ञानिक युग में। आपने राधा स्वामी सत्संग ब्यास के महाराज चरणसिंह के भी सत्संग केबल पर या फिर शहर की गली-गली में लगे आम ही सुने होगें। महाराज चरणसिंह अपने सत्संगों में रामचंद्र को भगवान का दर्जा देते हुए उसकी तुलना महातमा बुद्ध और ईसा से करते हैं। जबकि यह रामचंद्र वही था जिसने शंभुक ऋषी की गरदन काट कर उसका वद्ध कर दिया था सिर्फ इसलिए कि वे शुद्र होकर बहुत बुद्धवान था। यह रामचंद्र वही है जिसको संत नामदेव जी ने इतनी सदीयाँ पहिले ही भगवान नहीं माना था-

पांडे तुमरा रामचंदु सो भी आवतु देखिया था।।
रावन सेती सरबर होई घर क जोइ गवाई थी।।
और
मन महि झूरै रामचंदु सीता लछमण योगु।।
हणवंतरु आराधिया आइआ करि संजोगु।।

राधा स्वामी जो नामदान अपनी संगत को देते है, उसको वह युगों से चला आ रहा बताते हैं लेकिन उस नामदान की रचना हमारे अछूत रहबरों ने की है और ब्राह्मणवाद और दलित रहबरों की विचारधारा को आपस में मिलाकार राधा स्वामी सत्संग ब्यास वाले लोगों को मुर्ख बना रहे हैं। यदि इन सभी बातों के बारे में राधा स्वामीयों से बात करो तो वह कह देते हैं कि हमारे बाबा जी बाहरमुखी नहीं अंत्रमुखी हैं।

अपने आप को गुरू-सतिगुरू कहने वालों ने अपने ही अलग-अलग पंथ बनाए हुए हैं। हमारे रविदासीयों का रुझान नूरमहल के डेरे दिव्य जोति जाग्रित संसथा की तरफ भी बहुत हो चुका है। यह तो सीधे तौर पर ही ब्राह्मणवाद का प्रचार कर रहें है जो थोड़ी सी ब्राह्मणवाद की समझ रखने वाला समझ सकता है। ब्राह्मणवाद का प्रचार-प्रसार करना इन डेरों की मजबुरी हो सकती है पर दलित लोगों की क्या मज़बुरी है। यदि लोग खुद समझ जाएँ तो यह जो प्रतिदिन इन डेरों के कारण लड़ाई-झगड़े, खून-खराबा होता है यह ना हो और इनकी वजह से न ही लोग मरें। प्रशासन अधिकारी भी सोच में पड़ जाते हैं, उनको यह समझना कठिन हो जाता है कि डेरेदार ग़लत हैं या फिर इनका विरोद्ध करने वाले ग़लत हैं।

गुरू रविदास जी के बेग़मपुरे वाली विचारधारा पर कोई भी डेरा या डेरे का संत-बाबा नहीं पहुंच सका। अपने आप को रविदासिए या आदिधर्मीयों के डेरे कहाने वालों की भी यही दुर्दशा है। रामचंद्र की फोटो के नीचे संत गुरदीप गिरी महाराज के फोटो लगें हुए पोस्टर मैने शहिर में अपनी आँखों से देखे हैं। यही संत, जब हिन्दुवादी लोग गुरू रविदास जन्म स्थान मंदिर में कृष्ण की मूर्तीयाँ रखने के लिए जा रहे थे तब यह उनके साथ स्टेज पर बैठा था। वो तो अच्छा है कि गुरू रविदास जन्म सथान मंदिर में किसी कारण मूर्तियाँ नहीँ रखी जा सकी नहीं तो अपने आप को रविदासिए कहलाने वाला यह संत कृष्ण की मूर्तियाँ वहाँ रखाने में हिन्दूवादी लोगों का भागीदार होता। वैसे यह बाबा जी भी गुरू रविदास जी के शब्द बेग़मपुरा की बहुत अच्छी व्याख्या कर लेते हैं पर खुद बेग़मपुरे वाली विचारधारा से निर्लेप ही लगते हैं।

अब आप इन रविदासिए डेरे कहलवाने वालों की आपस में चिढ़ देख लो, जो यह लोग बेग़मपुरे का प्रतिदिन ढ़ंडोरा पीटते हैं पर खुद ही बेग़मपुरा बसने नहीं दे रहे जिसकी उदाहरण है संत बाबा प्रीतम दास बाबा जौड़े राएपुर-रसूलपुर में मिती 06-07-2008 को करवाया गया गुरू रविदास जी को समर्पत पहिला सैमीनार। इसमें रविदासीया कौम के सारे शेर-बाबे एक सोची-समझी साजिश के अधीन शामिल हुए और यह सभी चमार कौम को एक बहुत बढ़ा गिफ्ट देने लगे थे, वो गिफ्ट था एक ओर गुरू रविदास जन्म अस्थान मंदिर। जो इन्होंने पुरे सैमीनार में मुद्दा उठाया था वो भी यही था। पुरा दिन सैमीनार में यही मुद्दा चलता रहा कि एक औऱ जन्म स्थान मंदिर बनाया जाए क्योंकि उन्हें लगता था जो डेरा सच्चखंड बल्लां के अधीन जन्म स्थान मंदिर है वो सही जगह पर नहीं है। इस सैमीनार में स्टेजसैक्टरी की सेवा संत बाबा निर्मल सिंह ने निभाई थी जो पुरा दिन यही शोशेबाज़ी करता रहा कि गुरू रविदास जी का जन्म स्थान मंडूआ डीह है, इसलिए वहाँ जन्म स्थान दौबारा बनाया जाए।

इस सैमीनार में संत चरण दास, संत हरी दास, संत जसविंदर सिंह, संत सर्वण दास, संत हरचरण दास,संत कुलवंत दास, संत चंदर हंस, संत सरबजीत सिंह, संत प्रेम दास, संत सर्वण दास बोहण, संत जसवंत सिंह रावलपिंडी, संत मंगल दास, संत करतार दास, संत सरवण दास ताजपुर, संत कपूर दास, संत टहिल दास, संत हरप्रीत, संत भगीरथदास, संत गुरमेल दास, संत बिंदर दास, संत सरवजीत सिंह, संत हाकम दास, संत भगत राम, संत नाजर सिंह, संत सतनाम दास, संत सोढी शाह, संत गुरदीप गिरी, संत हरी ओम, संत सतनाम, संत जगदीशर्व नंद लाल और संत शिंगारा दास विशेष तौर पर आये थे। यह सभी स्टेज सेक्टरी की माँग से सहमत थे क्योंकि इनमें से किसी ने भी स्टेज सेक्टरी की बात को टोका नहीं। इसमें “हर” के निशान को भी मुद्दा बनाया गया जबकि जिस डेरे में यह सम्मेलन हो रहा था वहाँ खुद “हर” का निशान लगा था और संत सर्वणदास सलेम टाबरी जिन्होंने “हर” के निशान पर बहुत बढ़ीया आर्टीकल लिखें हैं वो भी उस समय मौनधार कर बैठे थें। वही सलेम टाबरी अब आदि धर्मीयों साधुयों के कौमी प्रधान है जबकि आदि धर्मी “हर” के निशान के विरुद्ध हैं और आदि-धर्मीयों का निशान साहिब अलग है। इन सभी साधूयों ने जन्म सथान की बात क्यों की, क्योंकि उन्हें लगता था कि इस जन्म स्थान मंदिर का सारा दारो-मदार उनके हाथों में होगा।

एक ओर गुरू रविदास जन्म स्थान मंदिर बनाने की ज़िद इन संतों की इतनी बढ़ गई कि आख़रकार लेखक डा. एस. एल. विर्दी को अपने भाष्ण में यह सलाह देनी पड़ी कि कोई बीच का रस्ता निकाला जा सकता है, एक को कर्मभूमि मान लिया जाए और एक को जन्मभूमि मान लिया जाए क्योंकि अक्सर ऐसे महापुरूषों की दो दो भूमियाँ होती है एक कर्मभूमि और एक जन्मभूमि। डॅा. एस. एल. विर्दी के बाद संत गुरदीप गिरी महाराज ने अपने आप की गुरू रविदास जी से तुलना करते हुए यहाँ तक कहि दिया कि डा. एस. एल. विर्दी की बात सही है अक्सर महापुरूषों की दो दो भूमियाँ होती है एक कर्मभूमी और एक जन्मभूमि, मेरा भी जन्म किसी ओर स्थान का है परन्तु आज मुझे पठानकोट वाले के नाम से जाना जाता है। देखो, यह हाल है हमारे समाज में पैदा हुए डेरेदारों का जो अपनी तुलना तो बेग़मपुरे के स्वपनसाज से करते हैं पर खुद रामचंद्र की फोटो के नीचे फोटो लगाने और कृष्ण की मूर्तियाँ रखने वालों का साथ देते हैं। यह है हमारे समाज के संतों का हाल जो कि ब्रह्मणवादी सोच के धारण किये हुए हैं लोगों में फुट डालो और अपना राज स्थापित करो, मुफ्त का खाओ भी औऱ अपना नाम भी पवित्र करके दुनियाँ से जाओ। आप खुद देख लो इन संतों-भेषधारीयों के कितनी तंग सोच हैं। इन्होंने समाज को भर्म-जंजाल से निकालना तो दूर यह तो खुद ही समाज को भर्मों में फंसाने की तरकिवे निकालते हैं। फिर यह लोग गुरू रविदास जी के बेग़मपुरे का रस्ता लोगों को क्या दिखलाएँगे। ओर तो ओर सिक्ख लीडर जो डेरावाद-डेरावाद करते हुए नहीँ थकते वो भी इन संतों के आगे पीछे घूमते थे जब संत रामानंद का कत्ल हुआ था। वो इसलिए कि जो गुरू रविदास साधू संप्रदाय सोसाइटी फ़रमान जारी कर देगी इसी को लोगों ने मान लेना है। लोगों ने इन संतों की बात को मानते हुए गुरु रविदास गुरुघरों में से गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश हटाना नहीँ है प्रन्तु लोगों के साथ किसी को कुछ लेना-देना नहीं है। भलाई नाम की चीज़ बस इन डेरों तक ही सीमत रह गई है। लीडर चाहे वो कांग्रसी हो या अकाली या भाजपाई सब का संपर्क आम लोगों से टूट गया है बस डेरों से ही संबंध रखा जा रहा है।

अब बात करतें हैं साधु संप्रदाय सोसाइटी से अलग हुए डेरा संत फूल नाथ चहेड़ू वाले संत जी की। संत जी ने एक बयान में कह दिया था कि जहाँ जहाँ गुरू ग्रंन्थ साहिब का प्रकाश है और “हर” के निशान लगें हुए हैं सिक्ख जत्थेबंधीयों को चाहिए वह वहाँ अपना धार्मिक चिन्ह लगा कर गुरू रविदास गुरूघऱों पर अपना कब्जा कर लें। संत जी की कितनी तंग सोच है ऐसी घटीया बयानबाजी तो आम आदमी करे तो बर्दाश्त की जा सकती है पर संत जी ने ऐसा क्यों कहा सिर्फ अपना नाम चमकाने के लिए। क्या यह कौम को जोड़ने का तरीका है? चहेडू वाले संत कृष्ण नाथ ने ही डेरा बल्ला के बाद ब्राह्मणवादी मिलावट वाली अमृतिवाणी का प्रचार सबसे अधिक किया है। यह वही बाणी है जो हिन्दू लेखक डा. धर्मपाल सिंगल ने डेरा बल्लाँ को सोंपी थी तांकि लोग गुरू रविदास जी के नाम पर ब्राह्मणवाद में फंस जाएँ। यह हिन्दू लेखक डा. धर्मपाल सिंगल अपनी पुस्तकों में इसी मिलावट वाली बाणी से गुरू रविदास जी को वैष्णव संत सिद्ध किया करता था तो इसी मिलावट वाली वाणी का प्रचार संत चहेड़ू वाले ने डेरा बल्लाँ के बाद सबसे ज़्यादा किया है। इस ब्राह्मणवादी झूठी बाणी का प्रचार करते करते वो यह भी भूल गए कि उनके अपने डेरे में भी कभी गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश होता था इसलिए वो किसी को अपना डेरा देकर दिखाए, फिर किसी को ऐसी सलाह दें। ज़मीन, जगह, जायदाद या घर की कीमत वही समझ सकता है जिसने अपने हाथों से मेहनत करके बनाया हो। यदि दलित वर्ग के लोगों ने अपनी कमाई में से गुरूघरों की ज़मीनें लीं है तो किसी को क्यों दें। अभी तो बड़ी मुशिक्ल से हम यहाँ तक पहुंचे हैं। पर ऐसे संत अपना नाम चमकाने के चक्कर में सोच-समझकर भी नहीं बोलते। एक और संत है- संत भगवान दास नगर वाले यदि इनके पास कोई व्यकित किसी दूसरे संत जैसे बल्लां वाले का नाम भी ले दे तो यह संत जी वहीं संगत के सामने गालियाँ निकालने लगता है। यह आजकल के संतों का हाल है ब्राह्मणवादी मानसिकता कि अपने आप को उच्चा समझना बाकी सब नीच। वैसे ब्राह्मण इनसे अच्छा था क्योंकि एक ब्राहमण कम से कम दूसरे ब्राह्मण को तो अपने बराबर समझता था लेकिन यह संत तो…बस। फिर बेग़मपुरे वाली विचारधारा इन संतों में कैसे उपज सकती है।

अब बात करते हैं उदासीन डेरा सच्चखंड बल्लां, जालन्धर की। इस डेरे के ट्रस्ट और उदासी संतों ने रविदासिए या चमार कौम को धर्म देने की कोशिश की पर असफ़ल रहे। रविदासी कौम के अमर शहीद संत रामानंद जी के कत्ल के बाद डेरा बल्लां ने अपना अल्ग ग्रंथ और पंथ का ऐलान कर दिया था। पर वे एक बात भूल गए, बाबा साहिब डा. अम्बेडकर जी ने कहा था, ”धर्म कोई बच्चों का खेल नहीं है और ना ही मौज-मस्ती या मनोरंजन का विष्य है। यह तो पुरे दलित समाज की ज़िंदगी या मौत का सवाल है। जैसे एक कैप्टन को अपना जहाज़ एक बंद्रगाह से दुसरी बंद्रहगाह तक लेकर जाने के लिए पूरी तैयारी करनी पड़ती है ठीक ऐसे ही धर्म के लिए करनी पड़ती है।” इसके उलट दलित जब सुबह नींद से उठते हैं तो इन्हें पता चलता है कि लो भई आप का धर्म यह है और दूसरे दिन पता चलता है कि आज आपका धर्म यह है, कोई भी तैयारी नहीं, वही पुरानी ब्राह्मणवादी घसी-पिटी पुर्बले कर्मों की कहानीआँ, नरक-स्वर्ग, कर्म-काँड, कोई विज्ञानक सोच नहीं। इसी तरह लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने के लिए डेरा सच्चखंड बल्लां जालन्धर ने नये धर्म का ऐलान किया था। लेकिन डेरा बल्लां गुरू रविदास साधु संप्रदाए सोसाईटी को भी अपने साथ मिला ना सका और तो और डेरे के ही जाने जाते संत सुरिन्दर दास कठार वाले और संत गुरबचन दास डेरे से पुरी तरह टूट गए। जो लोग इस डेरे से जुड़े हुए थे वो भी सुभाविक रूप से दो-तीन ग्रुप में बंट गए। गुरु रविदास जी का नाम लोगों का ध्यान खींचने के लिए जरूर ले लिया जाता है मगर यह डेरे गुरू रविदास जी की विचारधारा पर खरे नहीं उतरते। हर एक संत या डेरे की अपनी निजी विचारधारा और निजी हित्त भी हैं। जो गुरू रविदास जी के नाम के साथ साथ अपनी निजी विचारधारा को भी लोगों में फैलातें है यह जरूरी नहीं होता कि ऐसे संतों की और ऐसे डेरों की निजी विचारधारा या हित्त गुरू रविदास जी की बेग़मपुरे वाली विचारधारा से मेल खातें हों। इसीलिए यह डेरे लोगों को एकजुट करने में असफ़ल हुएँ हैं। आज तक हमें यही शिक्षा मिली है कि इन डेरों की विचारधारा गुरू रविदास जी के बेग़मपुरे से क्या मिलनी! इन डेरों की आपस में ही विचारधारा नहीं मिलती। डेरा सच्चखंड बल्लां जालन्धर की असफ़लता का कारण उनकी निजी विचारधारा ही है उन्होंने गुरू रविदास जी के बेग़मपुरे की विचारधारा को नहीं समझा बस अपने निजी हित्तों को लेकर डेरा आगे बढ़ने की कोशिश करता रहा, इस डेरे के संतों के भी अपनी निजी विचारधारा है जो गुरू रविदास जी के बेग़मपुरे से सुमेल नहीं करती। डेरा बल्लां के शहीद संत रामानंद जी को डेरे में ही रामायण का पाठ करते हुए संगत ने आम ही देखा होगा और ब्राह्मणवादी ढंग से करवाए जाने वाले सम्पूर्ण पाठ भी सभी को पता ही है जैसे आज मिलावट वाली अमृतवाणी के पाठ करवाए जाते हैं। यहाँ तक की शहीद संत रामानंद जी लोगों को घऱों में सुख-शांति के लिए गीता का पाठ करवाने की सलाह भी दे देते थें। संत रामानंद जी की शहादत चाहे रहती दुनियां तक जिंदा रहेगी पर जिस डेरे में वो रहते थे उस डेरे के भी अपने निजी हित्त थे वहां के संतों की निजी विचारधारा थी। जब पंजाब में आदिधर्म की स्थापना हुए तो उन्होंने अपना अलग से ग्रंथ बनाया था तो उदासी संत सर्वणदास डेरा बल्लां ने इस ग्रंथ को मानता नहीं दी थी (कारण चाहे कोई भी हो) लेकिन अब यदि इनके द्वारा बनाए गए मिलावाट वाली ब्राह्मणवादी अमृतवाणी ग्रंथ को कोई मानता नहीं देता तो डेरा बल्लां के श्रृदालु उसे गद्दार कह कर बुलाते हैं।

नए धर्म का ज़्यादा हो-हल्ला पाने वालों में से संत सुरिन्द्र दास बावा ने भी पैसा इकट्ठा करने पर ही ध्यान दिया। इसने लोगों की गुरू रविदास जी के साथ जुड़ी भावनायों के साथ खेलने का अंदर ही अंदर मन बनाया हुआ था। इसने धर्म को एक खेल समझा और प्रधान गुरदियाल सिंह (जिसके नाज़ायज संबंधों के चर्चे फैलने के कारण डेरे से निकाल दिया और इसका साथ देने वाले संत सुरिन्द्र दास बावा जी को भी डेरे से निकाल दिया गया) के साथ मिलकर धर्म को मौज-मस्ती का विषय समझा। इन्होंने धर्म के नाम पर खूब पैसा लूटा, डेरे वालों ने सोचा कि हमसे कौन सा किसी ने पूछना है। भोले-भाले चमारों को यह फूंक चढ़ा दी गई कि आप को हमने रविदासीया धर्म दिया है जबकि यह रविदासीया नाम तो हमारा पहले से ही नाम है चमार नाम की तरह। जैसे लोग हमको चमार कह देते है वैसे ही रविदासिए भी कह देते हैं लेकिन सोचने वाली बात है इन्होंने हमें धर्म कौन सा दिया। परन्तु संत सुरिन्दर दास का पैसे लुटने का धर्म और पैसा इधर-उधर करने का पक्का धर्म बन चुका था। बावा जी(जिसको पंजाब से बाहर निकाल पूने किसी गुरू रविदास मंदिर में भेज दिया है)। खुद निर्मल कर्मों से मुक्त, धर्म के ऐसे ठेकेदार लोगों को क्या धर्म सिखाएँगे जो अपनी ही संगत से धोखा करते हैं वो पुरी कौम को क्या मुक्ति का रास्ता दिखाएँगे। धर्म की सीड़ी का सबसे पहले स्टेप है-

जो तुधु भावै सो निरमल करमा।। जो तुधु भावै सो सचु धरमा।। (पृष्ठ 180)

सब से पहले तो संतों के अपने खुद के कर्म निर्मल होने चाहिए, जिसने सबसे ज़्यादा धर्म का हो-हल्ला है। अंत निर्णय खुद के किए हुए निर्मल कर्मों पर होना है, धर्म के लिए अपने निजी हित्त भी कुरबान करने पड़ते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग आपको किस नज़र से देखते हैं क्योंकि आपको फर्क आप के खुद के किए हुए कर्मों से पड़ेगा। इसलिए धर्म कमाने के लिए खुद के किए हुए निर्मल कर्मों पर ज़ोर दिया गया है-

सरब धरम महि स्रेसट धरमु।। हरि को नामु जपि निरमल करमु।।

लोग आपको किस निगाह से देखते हैं या मैं आपको किस नज़रीए से देखता हूं इस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा फर्क तो आप के खुद के निर्मल कर्मों से पड़ेगा जिसके बिना धर्म नहीं कमाया जा सकता गुरू रविदास जी के बेग़मपुरे वाली बात तो बहुत दूर की है। आज चमार कौम यदि अपने आप को रविदासीया कहती है तो इसमें गुरू रविदास जैसी महान् शक्ति के निर्मल कर्म हैं जिन पर हमें गर्व हैं। पर निर्मल कर्मों को त्याग कर यदि कोई भी संत-साध गुरू रविदास जी का नाम लेकर अपना नाम चमकाने की कोशिश करेगा उसका अंजाम आज वही होगा जो डेरा सच्चखंड बल्लां से निकाले गए संत सुरिन्दर दास बावा का हुआ है क्योंकि अंतिम सच्च यही है-

सतिगुरु धरती धऱम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए।। (पंना 302)

जैसे हम सभी डेरों के हालात पढ़ चुकें है, अब इस बात की समझ आ जानी चाहिए कि डेरेदारों ने ब्राह्मणवाद की कौन सी मानसिकता अपना ली है जो मैं पहले भी बता चुका हूं वो है -मनुस्मृति (1, 99,100) की गवाही कि ब्राह्मण (आज का संत-साध-सतिगुरु) जन्म से ही सारे संसार में सर्वश्रेष्ट है। वह सारे (आज के संत-साध-सतिगुरु) प्राणीयों का ईश्वर है और सारे खज़ाने का रक्षक भी। इस संसार में जो भी सम्पती है, वह ब्राह्मण (आज का संत-साध-सतिगुरु) की निजी है। ब्राह्मण (आज का संत-साध-सतिगुरु) चाहे मुफ्त खाए, पराए वस्तर पहने, पराए धन को मुफ्त में ले, तभ भी सभी प्राणी उसके रिणी हैं क्योंकि सारे जीव ब्राह्मण (संत-साध-सतिगुरु) की दया से जीवत हैं। यही ब्राह्मणवादी विचारधारा अब हमारे दलितों में घर कर चुकी है। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है संभल सकतें है बस इस ब्राह्मणवादी मानसिकता को समझने की जरूरत है। ब्राह्मण का कहना है कि शूद्र को किसी की निंदा चुगली नहीं करनी चाहिए, इस सोच को त्याग दो हर बात पर तर्क करो, हरेक बात पर विचार करो, किसी के पीछे आँखें बंद कर ना लगें। सब को अपनी बात कहने का अधिकार है, यह डेरे और संत सीधे तौर पर समाज को प्रभावित कर रहें है लेकिन इन्हें समझने की कोई भी कोशिश नहीं कर रहा। यदि हम इनमें पैदा हो चुके ब्रह्मणवाद को समझ जाए तो हमारी कौम का ही नहीं, पूरे देश का सुधार हो जाए। पर हर कोई निंदा चुगली से डरता है, कोई श्रद्धा भंग होने से डरता है, कोई पाप समझता है, कोई अपनी हौमें के खिलाफ नहीं होना चाहता, कोई झूठे साधुओं के एहसानों तले दबा है और कोई मनमुख होना नहीं चाहता। यह सब किस के लिए। क्योंकि हम बेग़मपुरे को गुरू रविदास जी की बाणी के संर्दभ से नहीं समझ सके हमने सिर्फ ब्राह्मणवाद को पढ़ा है और इसी तर्ज से गुरू रविदास जी की बाणी को समझा और जाना है, जो गलत बात है।

अंत में मैं यही कहूंगा कि मैने तो इन्हीं कारणों के कारण डेरों का रास्ता त्याग दिया है वो भी हमेशा हमेशा के लिए। नहीं तो मैं भी दूसरे लोगों की तरह इन डेरों में जाकर बहुत खुश हुआ करता था और अपने आप को समाजिक भलाई के कामों से जुड़ा हुआ महिसूस करता था। परन्तु जैसे जैसे मेरी आँखे खुलती गई, पर्दे हँटते गए और डेरों का सच्चा सामने आता गया मैं पीछे हटता गया। यह तो मेरा अपना निजी तजुर्बा है, जरूरी नहीं कि आप मान लें आप जैसा करना चाहें, आप की मर्जी है, जैसे आप लोगों को अच्छा लगता है वैसा करें, इस से मुझे कोई फर्क नहीं, मैने जो समझना था, जानना था, समझ लिया जान लिया।

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One Response to Brahmanvaad aur Deravaad

  1. एकनाथ विश्वनाथ कोली says:

    बार बार हमे ऐसे मालूमात करते रहे हम आपके आभारी रहेंगे। ऐसा ज्ञान बाट ते रहो आज नही तो कल हमारे भारतीय बन्धु सम्भल जायेंगे ब्राम्हण मुसलमानों के बारेमे बहुत बोम्ब मरते हे हमे लड़ाई के लिए उकसाते रहते हे।

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