RUDRA-The Mulnivasi


जब ईसा से 3200 साल पहले यूरेशियन दक्षिण से भारत से आये उस समय उत्तर भारत में रुद्रों का शासन था। दक्षिण भारत में उस समय जो भी हुआ, वो भारत के लिए अभिशाप बन गया और उस अभिशाप को आज भी भारत के लोग झेल रहे है। उस समय अगर रुद्रों ने सही समय पर सही कदम उठा कर रोक दिया होता तो आज भारत और भारत के मूल निवासियों की यह हालत नहीं होती। उस समय पुरे भारत में कोई भी जाति प्रथा नहीं थी अर्थात सभी लोग मिल जुल कर रहते थे। वेदों और पुराणों का अध्ययन करने से पता चलता है कि उस समय भारत के मूल निवासियों को नागवंशी कहा जाता था। प्रमाण के लिए आज भी 11 रुद्रों के गले में नागों को देखा जा सकता है, आज भी 11 रुद्रों को नागों के राजा या सम्राट की उपाधि दी जाती है। शिव से लेकर

rudra-the-chamar1शंकर तक सभी रुद्रों को नागों से विभूषित दिखाया जाता है, इसी आधार पर ब्राह्मणों ने भी अपने एक आर्य विष्णु को नाग शैया पर सोया हुआ दिखाया था ताकि भारत के समतावादी और सामान रूप से रहने वाले नागवंशी विष्णु को रुद्रों के बराबर समझे और विष्णु को भगवान् माने। युरेशियनों को खुद तो कुछ नहीं आता था ना युरेशियनों में कोई सभ्यता थी। युरेशियन तो एक क्रूर और बर्बर जाति थी जो जहा भी जाते वहां सिर्फ विनाश करते थे। भारत के मूल निवासी बहुत भोले भाले थे, जबकि यूरेशियन बहुत चालक चतुर थे। मूल निवासी समता के साथ जिंदगी बिताना पसंद करते थे, काफी हद तक भारत के लोगों और रुद्रों की समतावादी नीति भी युरेशियनों के यहाँ बसने का कारण बनी।

ईसा से 3200 साल पहले भारत में गणतन्त्र था। भारत की सीमाए अफगानिस्तान से लेकर श्री लंका, ऑस्ट्रेलिया, भारत के प्रायदीप और दक्षिण अफ्रीका तक थी। पूरा देश 3-5 राज्यों में बंटा हुआ था। जिस में एक गणाधिपति, एक गणाधीश और गणाधीश के नीचे विभिन्न राज्यों के गणनायक होते थे। यह व्यवस्था बिलकुल आज के गणतंत्र जैसी थी, जिसमें रूद्र जो उस समय “गणाधिपति” कहलाते थे वह पीढ़ी दर पीढ़ी शासन करते थे। इसी कारण भारत पर 11 रुद्रों ने पीढ़ी दर पीढ़ी शासन किया। गण नायक समय समय पर राज्यों के लोगों द्वारा चुने जाते थे और सभी गण नायक मिल कर गणाधीश का चयन किया करते थे। उसी समय काल को भारत का “स्वर्ण युग” भी कहा जाता था और भारत को विश्व गुरु होने का गौरव भी प्राप्त था क्योकि उस समय भारत के अलावा दुनिया के किसी भी कोने या देश में गणतंत्र नहीं था। रुद्रों के विषय में पुराणों और इतिहास में कोई खास जानकारी नहीं मिलती क्योकि युरेशियनों ने काफी हद तक रुद्रों के इतिहास को नष्ट कर दिया है। आज जो भी जानकारी पुराणों और वेदों में उपलब्ध है उसे रुद्रों के बारे प्रमाणिक नहीं माना जा सकता। क्योकि “रूद्र परसना” “रूपा मंडाना” “विश्वकर्मा पूरण” “पदम् पूरण” “महाभारत” “वाल्मीकि रामायण” “अग्नि पूरण” “ज्योतिष शास्त्र” जैसे पुराणों का अध्ययन करने पर पाया गया कि सभी पुराणों में 11 रुद्रों के नाम अलग लिखे गए है तो रुद्रों के नामों की जानकारी सत्य साबित नहीं होती। अर्थात यूरेशियन रुद्रों से इतनी इर्ष्या और जलन करते थे कि युरेशियनों ने रुद्रों का नाम भी समाप्त कर दिया। लेकिन पहले रूद्र शिव और अंतिम रूद्र शंकर हुआ यह बात आज भी सत्य है और प्रमाणित है। क्योकि आज किसी को पता नहीं है की शिव से पहले क्या था? शिव को ही बहुत से धर्म सृष्टि का आधार मानते है। 11वे रूद्र शंकर के बारे वेदों पुराणों और इतिहास की बहुत सी किताबों में ढेर सारी जानकारी उपलब्ध है।

11वे रूद्र सम्राट शंकर के बारे अगर जानकारी इक्कठी की जाये तो बहुत सी बाते सामने आती है। सम्राट शंकर नामक रूद्र की राजधानी उतर भारत में स्थित थी। अफगानिस्तान से उतरी भारत, तिब्बत, नेपाल से पंजाब तक के राज्य की देखभाल शंकर करता था। आज भी अफगानिस्तान से उत्तरी भारत, तिब्बत और नेपाल पंजाब आदि के प्राचीन मंदिरों और कलाकृतियों का अध्ययन किया जाये तो हर मंदिर और प्राचीन कलाओं में नागों की नक्काशी की हुई पाई जाती है। उस समय रुद्रों का शासन चीन पर भी रहा होगा, लेकिन कोई ठोस प्रमाण ना मिलने के कारण हम यहाँ चीन का उलेख नहीं कर पा रहे है। फिर अगर चीन के लोगों की जीवनशैली को देखा जाये तो चीन के लोग आज भी नागों को ड्रेगनों के रूप में पूजते है या उनको मानते है। अर्थात रुद्रों का राज्य चीन में भी रहा होगा। रूद्र शंकर के बारे भी सारी सच्चाई वेदों और पुराणों से सामने आती है। शंकर के बारे अध्ययन करने पर पता चलता है कि शंकर का पहला विवाह नाग कन्या गौरा के साथ हुआ था। जो बहुत शक्तिशाली नाग कन्या थी और राज्य प्रबंधन में भी शंकर का साथ देती थी। उतर भारत के पुराने लोक गीतों, राजस्थान के पुराने लोक गीतों और द्रविड़ समाज के पुराने लोक गीतों से यह जानकारी सामने आती है। जोकि पीढ़ी दर पीढ़ी लोग गाते आ रहे है, और आज वह लोक गीत समय के अनुसार समाप्त होने के कगार पर है। उन्ही लोक गीतों और पुराणों को आधार मान कर यह बात भी सामने आती है कि सम्राट शकर की पत्नी गौरा ने उस समय यूरेशियन आर्यों के विरुद्ध बहुत से युद्धों में भाग लिया और हजारों आर्यों का विनाश किया। उसी गौरा को बाद में धोखे से यूरेशियन आर्यों ने आग में जला कर मार डाला और उसी को सती दाह कहा गया। जिस पर बाद में सती प्रथा की नीव राखी गई जो हजारों नाग कन्याओं की मौत का कारण बनी।

गौरा की मृत्यु के बाद नागराज, असुराधिपति, असुरराज सम्राट शंकर उदास रहने लगे। यहाँ बात आज भी प्रमाणित है, अगर वेदों और पुराणों का अध्ययन किया जाये और समाज में प्रचलित अति प्राचीन नाग कथाओं को सच माना जाये तो नागवंशी अपने जीवन साथी के बिना या तो जिन्दा नहीं रहते थे या बहुत उदास रहते थे। सम्राट शंकर के मृत्यु को वर्ण ना करने के पीछे दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि उस समय तक सम्राट शंकर के कोई भी संतान नहीं थी। तो समस्या यह भी थी कि सम्राट शंकर राज्य किसके अधीन छोड़कर जाते? क्योकि उस समय पुरे भारत का शासन सिर्फ रुद्रों के वंशज ही देखते थे। उस समय सभी यूरेशियन आर्यों ने मिलजुल कर भारत के प्रमुख पद गणाधिपति को भारत के मूल निवासियों से छिनने की चाल चली और आर्य कन्या पार्वती को शंकर के पीछे लगा दिया। पार्वती ने कई साल सम्राट शंकर का पीछा किया और शंकर को शादी के लिए मना लिया। परन्तु यूरेशियन आर्य ब्रह्मा के पुत्र आर्य दक्ष को यह बात अच्छी नहीं लगी कि उसकी बेटी को बलि की बकरी बनाया जाये। आर्य दक्ष की बेटी की शादी किसी मूल निवासी से हो यह बात भी दक्ष को पसंद नहीं थी। यही कारण था कि दक्ष हमेशा शंकर को नीचा दिखता था और खुद को बहुत बड़ा प्रजापालक समझता था। परन्तु सम्राट शंकर से डरता भी बहुत था क्योकि दक्ष को पता था कि आमने सामने की लड़ाई में सम्राट शंकर को पार पाना अर्थात जीत असंभव था। तब सभी देवताओं अर्थात यूरेशियन आर्यों ने मिल कर दक्ष को समझया और पार्वती का विवाह सम्राट शंकर से करवा दिया। विवाह के कुछ समय बाद शंकर अपने राज्य प्रबंधन के कार्य से अपने राज्य में भ्रमण करने चले गए। जब कुछ सालों बाद सम्राट शंकर वापिस आये तो उनके घर के दरवाजे पर एक आर्य पुत्र खड़ा पाया जिसने सम्राट शंकर को अन्दर प्रवेश करने से रोक दिया। आर्य पुत्र का दु:साहस सेख कर सम्राट शंकर को क्रोध आ गया और उसको वहा से हटा कर सम्राट शंकर अन्दर चले गए। यहाँ यह कहना की सम्राट शंकर ने उस बालक को मार दिया तो यह बात ना तो न्यायोचित है और ना ही न्यायसंगत। क्योकि सम्राट शंकर जैसा महाबलशाली, महापराक्रमी राजा एक छोटे से बालक की हत्या कैसे कर सकता था। अब वो बालक कहा से आया इस बात का जो उलेख पुराणों में किया गया है वो एक बहुत बड़ा झूठ है। ना ही तो पार्वती ने अपने मैला निकला, ना ही किसी बालक का निर्माण किया, ना ही उस बालक को मारा गया और ना ही बाद में जिन्दा किया गया। क्योकि यह बात विज्ञान संगत नहीं है, किसी भी आदमी के बच्चे को मार कर जिन्दा कैसे किया जा सकता है? किसी आदमी के बच्चे की गर्दन पर हाथी जैसे जानवर का सिर कैसे जोड़ा जा सकता है? वास्तव में पार्वती चरित्रहीन औरत थी, जिसने किसी आर्य से शारीरिक सम्बन्ध बनाकर एक पुत्र को जन्म दिया था और आर्यों ने उस बालक को रुद्र्वंश का राजा बनाने की चाल चली गई थी।

सम्राट शंकर तो हमेशा राज्य कार्यों में व्यस्त रहते थे तो उनके पास समय कम होता था। जिसको यूरेशियन आर्यों ने बाद में सम्राट शकर का हमेशा अपने गणों के साथ नशे में मगन रहने का झूठा प्रचार किया। सम्राट शंकर के राज्य में सभी मूल निवासी मिलजुल कर रहते थे, उन में से कोई मांसाहारी था तो कोई शाकाहारी, परन्तु आपस में कोई भेद-भाव नहीं था। लेकिन यूरेशियन आर्यों ने इसका हमेशा ही गलत प्रचार किया, सम्राट शंकर के गणों को जो सम्राट शंकर की राज्य प्रबंधन में सहायता करते थे उनको भुत, प्रेत, पिशाच और राक्षस तक कहा। सम्राट शंकर का शासन पुरे भारत में था, ये बात यहाँ से भी प्रमाणित हो जाती है कि आज भी उतर भारत से लेकर दक्षिण और पूर्वी भारत से पश्चिम भारत के लोग सम्राट शंकर को किसी न किसी रूप में अपने महादेवता के रूप में मानते है। आज भी सभी आदिवासी कबीलों में सम्राट शिव से लेकर सम्राट शंकर तक सभी रुद्रों के बारे लोक गीत गाये जाते है। लोग तरह तरह से उस रुद्रों के शासन काल को याद करते है।

पार्वती के द्वारा विश्वास भंग करने के बाद सम्राट शंकर पार्वती से दूर दूर ही रहा करते थे। इसी से दुखी हो कर पार्वती ने महाशिवरात्रि की रात को सम्राट शंकर को भांग का घोटा बना कर, उस में जहर मिला कर सम्राट शंकर को पीने को दे दिया और सम्राट शंकर की मृत्यु हो गई। जहर से सम्राट शंकर की काया नीली हो गई, मृत्यु के बाद अगले दिन सम्राट शंकर का शरीर बहार निकला गया और एक बड़ी सी शिला पर बिठा दिया गया और भारत के मूल निवासियों को बता दिया गया कि सम्राट समाधि में चले गए है। कही भारत के मूल निवासी विद्रोह ना कर दे, इस लिए सारे भारत के लोगों को बताया गया कि धरती को बचाने के लिए सम्राट शंकर ने जहर पीया है, प्रचारित किया गया। जो बाद में समुद्र मंथन के साथ जोड़ दिया गया। ना कभी समुद्र मंथन हुआ, ना कभी जहर निकला, ना किसी ने वो जहर पिया और ना ही कभी अमृत निकला। असल में रुद्रों का शासन हड़पने को भारतीय पुराणों और वेदों में अमृत मिलाना कहा गया है। जो यूरेशियन आर्यों के लिए बहुत बड़ी बात थी, और आज भी यूरेशियन सम्राट शंकर के मृत्यु दिवस को धूमधाम से मानते है। और सारे मूल निवासी भी अपने देश के सबसे बड़े और अंतिम सम्राट की मृत्यु का जश्न यूरेशियन आर्यों के साथ मानते है।

सम्राट शंकर की मृत्यु तो आर्य घोषित नहीं कर पाए क्योकि अगर सम्राट शंकर की मृत्यु घोषित कर दी जाति तो पुरे देश में विद्रोह हो जाता और यूरेशियन आर्यों का नामो निशान इस देश से और इस दुनिया से मिट जाता और सम्राट शंकर के शरीर को सबके सामने बिठा कर हमेशा-हमेशा के लिए मूल निवासियों का भगवान् बना दिया और उसकी आड़ में आर्यों ने भारत पर अपना शासन शुरु किया। अब यूरेशियन आर्यों के हाथ में भारत की मुख्य शासन तंत्र आ गया था और उसी को समयानुसार अमृत बोला गया जो सिर्फ यूरेशियन आर्यों को प्राप्त हुआ था।

सम्राट शंकर का वंश यही समाप्त नहीं हो गया था। पार्वती के विश्वास घात के बाद बहुत सी जगहों पर सम्राट शंकर ने और औरतों के साथ बच्चे पैदा किये थे। जिन में एक बच्चा दक्षिण भारत में भी पैदा किया गया था और उसका नाम कार्तिक था। लेकिन कार्तिक को किसी भी आर्य ने रुद्रों की संतान नहीं माना तो वह हमेशा के लिए दक्षिण भारत में ही रह गया। इस प्रकार यूरेशियन आर्यों ने भारत से रूद्र शासन का अंत कर दिया। और रुद्रों का नाम इस ख़त्म कर दिया। यूरेशियन आर्यों की नीचता का पता इस बात से भी लगता है कि उन्होंने एक झूठी काल्पनिक कहानी गढ़ कर सम्राट शंकर का लिंग बना दिया। और उसको योनी में खड़ा कर दिया। और आज सारा भारत उसी को शिवलिंग के नाम से पूजता है, कोई यह नहीं जानता कि वो शिवलिंग आया कहा से, किसने बनाया? आज कोई भी मूल निवासी बहुत से मूल निवासी सम्राट शंकर को अपना सम्राट तक नहीं मानते। सभी आँखे बंद कर के ब्राह्मणों की बताई बातों पर चलते है, और अपने सम्राट शंकर को हर राज बे-इज्ज़त होते देखते है। कोई भी इस प्रथा का विरोध तक नहीं करता। हमारी टीम ने कई दिनों की मेहनत के बाद ये सच ढूंढ कर निकला। लेकिन फिर भी हमारे ही मूल निवासी हमे ही गलियां देंगे। कोई सच जानना नहीं चाहेगा।
अब प्रश्न उठता है कि रूद्र वंश के लोग कहा गए? इतना महान वंश ऐसे ही ख़त्म तो नहीं हो गया होगा? तो हमारी टीम ने उतर भारत के सभी राज्यों का इतिहास ढूंढा तो पता चला कि जम्मू और कश्मीर के आस पास के प्रदेशों पर ईसा से 200 साल पहले से 550 इसवी तक चमारों का शासन था। यह बात आप भारत के आधुनिक इतिहास में भी पढ़ सकते हो और जान सकते हो कि जम्मू कश्मीर के आसपास के राजा चमार हुआ करते थे। ये बात आज सारी दुनिया मानती है। जम्मू कश्मीर में पुरात्व विभाग द्वारा खुदाई के बाद ईसा से 200 साल पहले के सिक्के मिले है। जिन पर शिव और शंकर आदि रुद्रों के चिन्ह और मूर्तियाँ पाई गई। इस का अर्थ यह निकलता है। रूद्र वशं के लोगों पर यूरेशियन आर्यों ने मनचाहे अत्याचार किये और उनको मृत जानवरों को खाने पर विवश किया। रूद्र वंश का इतना पतन किया गया कि आज वही रूद्र वंश चमार जाति के नाम के साथ समाज में अपनी पहचान भूल कर खुद को निरह समझ कर सामाजिक अत्याचारों का सामना कर रहा है।
सभी पाठक गण कृपया यह ना समझे कि हमारी टीम में सिर्फ चमार ही है और हम जानबूझ कर चमारों को बहुत बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहे है। हमारी टीम में ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई हर जाति के लोग है, जिनको आज ये सभी यूरेशियन शुद्र बुलाते है। हम सभी सिर्फ मूल निवासी है। जो सिर्फ मूल निवासियों के हित में कार्य कर रहे है। सभी पाठक गणों से प्रार्थना है कोई भी टिपण्णी करने से पहले ऊपर दिए गए प्रमाणों पर विचार करे।
कर्मश:

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16 Responses to RUDRA-The Mulnivasi

  1. bhupender says:

    Could you please do a little more favour and tell the reference of the information you are sharing so that people can be more satisfied about the authenticity of the information.

  2. Brajpal Singh says:

    धन्यवाद

  3. jeet k says:

    Plz durga ke bare mein bhi kuch jankari de…

    Ramayana aur Mahabharata per bhi kuch prakash dale…
    As per my opinion both are fictional work..

    • Bheem Sangh says:

      हम जल्दी ही इन सभी पर जानकारी देंगे…

  4. Shankar BASAPPA Navkudkar says:

    आर्य ब्राह्मण चोर आहेत साले।
    मी त्या देवाला कधी पाया पडणार नाही

  5. Very good site sir . I feel better to know about himself history.

  6. good……………….

  7. मनोज says:

    आपकी जानकारी में बहुत ही सटिकता ह , कियोकि में और मेरा मित्र भी चमार और जाटव तथा नागवंनसि हिस्ट्री खोज रहे ह जो आपसे लेख से बहुत मिलती ह , आपको साथ ही साथ कुछ किताबो का भी रेफरेंस जोड़ना चईये जिससे की और अधिक सत्यता हो जाये

  8. SUDHIR says:

    भाई शंकर को दुनिया का सम्राट मैं तो आज भी मानता हूँ।

  9. s k jogi says:

    shiv gaurakhji ke bare main bhi batye , please

  10. Amit kumar says:

    Aur jankari do apne smaj ki

  11. आपने हमारे वास्तविक इतिहास के बारे मे जानकारी दी है। इसके लिये धन्यवाद। कृपया संबंधित कुछ पुस्तको के नाम भी दे तो ज्यादा जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

  12. babloo chmar says:

    Sir kyaa aap sach kah rhai hai kya sankar bhee chmar jaati kai hai

  13. aravind mashetty says:

    Meny meny thanks

  14. Pappan says:

    yahan ek shak ho raha hai ki parwati ek aarya kanya thi ? Aarya to aurat lekar nahin aa the ? Kripya mera shak dur karen.

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