Mahatma Buddha


mahatma_budhaगौतम बुद्ध का मूल नाम ‘सिद्धार्थ’ था । सिंहली, अनुश्रुति, खारवेल के अभिलेख, अशोक के सिंहासनारोहण की तिथि, कैण्टन के अभिलेख आदि के आधार पर बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध की जन्म तिथि 563 ई.पूर्व स्वीकार की गयी है । इनका जन्म शाक्यवंश के राजा शुद्धोदन की रानी महामाया के गर्भ से लुम्बिनी में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था । शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में उनका जन्म हुआ । इसकी पहचान नेपाल की तराई में स्थित रूमिनदेई नामक ग्राम से की जाती है । सिद्धार्थ की माता मायादेवी उनके जन्म के कुछ देर बाद मर गई थी । कहा जाता है कि फिर एक ऋषि ने कहा कि वे या तो एक महान राजा बनेंगे, या फिर एक महान साधु । बुद्ध शाक्य गोत्र के थे । बुद्ध को शाक्य मुनि भी कहते हैं । सिद्धार्थ अपने शुरुआती दिनों में रोगी, बूढा और मृत शरीर को देखकर उन्हें वितृष्णा हुई । राजपरिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने जीवन की सारी सुविधाआँ का त्याग कर सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हेतु बोधगया में कठोर तप किया और बुद्ध कहलाए । उनके समकालीन शक्तिशाली मगध साम्राज्य के शासक बिम्बिसार तथा अजातशत्रु ने बुद्ध के संघ का अनुसरण किया । बाद में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, जापान, तिब्बत तथा चीन तक फैलाया । ज्ञान प्राप्ति पश्चात भगवान बुद्ध ने राजगीर, वैशाली, लौरिया तथा सारनाथ में अपना जीवन बिताया । उन्होने सारनाथ में अंतिम उपदेश देकर अपना शरीर त्याग दिया । आज बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है ।
       यह विधाता की लीला ही थी कि लुम्बिनी में जन्म लेने वाले बुद्ध को काशी में धर्म प्रवर्त्तन करना पड़ा । बुद्ध (सिद्धार्थ) के जन्म से पहले उनकी माता ने विचित्र सपने देखे थे । पिता शुद्धोदन ने ‘आठ’ भविष्य वक्ताओं से उनका अर्थ पूछा तो सभी ने कहा कि महामाया को अद्भुत पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी । यदि वह घर में रहा तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और यदि उसने गृह त्याग किया तो संन्यासी बन जाएगा और अपने ज्ञान के प्रकाश से समस्त विश्व को आलोकित कर देगा । शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा, उसमें क्षत्रियोचित गुण उत्पन्न करने के लिये समुचित शिक्षा का प्रबंध किया, किंतु सिद्धार्थ सदा किसी चिंता में डूबे दिखाई देते थे । अंत में पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांध दिया । एक दिन जब सिद्धार्थ रथ पर शहर भ्रमण के लिये निकले थे तो उन्होंने मार्ग में जो कुछ भी देखा उसने उनके जीवन की दिशा ही बदल डाली । एक बार एक दुर्बल वृद्ध व्यक्ति को, एक बार एक रोगी को और एक बार एक शव को देख कर वे संसार से और भी अधिक विरक्त तथा उदासीन हो गये । पर एक अन्य अवसर पर उन्होंने एक प्रसन्नचित्त संन्यासी को देखा । उसके चेहरे पर शांति और तेज़ की अपूर्व चमक विराजमान थी । सिद्धार्थ उस दृश्य को देख-कर अत्यधिक प्रभावित हुए ।
       बुद्ध को ‘गौतम बुद्ध’, ‘महात्मा बुद्ध’ आदि नामों से भी जाना जाता है । वे संसार प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक माने जाते हैं । बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है । इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन आज भी बढ़ रही है । वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे । उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला गया और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया । आज बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं- ‘थेरवाद’, ‘महायान’ और ‘वज्रयान’ । बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है ।
       सिद्धार्थ के मन में निवृत्ति मार्ग के प्रति नि:सारता तथा निवृति मर्ण की ओर संतोष भावना उत्पन्न हो गयी । जीवन का यह सत्य सिद्धार्थ के जीवन का दर्शन बन गया । विवाह के दस वर्ष के उपरान्त उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । पुत्र जन्म का समाचार मिलते ही उनके मुँह से सहसा ही निकल पड़ा- ‘राहु’- अर्थात बंधन । उन्होंने पुत्र का नाम ‘राहुल’ रखा । इससे पहले कि सांसारिक बंधन उन्हें छिन्न-विच्छिन्न करें, उन्होंने सांसारिक बंधनों को छिन्न-भिन्न करना प्रारंभ कर दिया और गृहत्याग करने का निश्चय किया । एक महान रात्रि को 29 वर्ष के युवक सिद्धार्थ ज्ञान प्रकाश की तृष्णा को तृप्त करने के लिये घर से बाहर निकल पड़े । कुछ विद्वानों का मत है कि गौतम ने यज्ञों में हो रही हिंसा के कारण गृहत्याग किया । कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार गौतम ने दूसरों के दुख को न सह सकने के कारण घर छोड़ा था ।
       गृहत्याग करने के बाद सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में भटकने लगे । बिंबिसार, उद्रक, आलार एवम् कालाम नामक सांख्योपदेशकों से मिलकर वे उरुवेला की रमणीय वनस्थली में जा पहुँचे । वहाँ उन्हें कौंडिल्य आदि पाँच साधक मिले । उन्होंने ज्ञान-प्राप्ति के लिये घोर साधना प्रारंभ कर दी । किंतु उसमें असफल होने पर वे गया के निकट एक वटवृक्ष के नीचे आसन लगा कर बैठ गये और निश्चय कर लिया कि भले ही प्राण निकल जाए, मैं तब तक समाधिस्त रहूँगा, जब तक ज्ञान न प्राप्त कर लूँ । सात दिन और सात रात्रि व्यतीत होने के बाद, आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और उसी दिन वे तथागत हो गये । जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह आज भी ‘बोधिवृक्ष’ के नाम से विख्यात है । ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी अवस्था 35 वर्ष थी । ज्ञान प्राप्ति के बाद ‘तपस्सु’ तथा ‘काल्लिक’ नामक दो शूद्र उनके पास आये । महात्मा बुद्ध नें उन्हें ज्ञान दिया और बौद्ध धर्म का प्रथम अनुयायी बनाया ।
       बोधगया से चल कर वे सारनाथ पहुँचे तथा वहाँ अपने पूर्वकाल के पाँच साथियों को उपदेश देकर अपना शिष्य बना दिया । बौद्ध परंपरा में यह उपदेश ‘धर्मचक्र प्रवर्त्तन’ नाम से विख्यात है । महात्मा बुद्ध ने कहा कि इन दो अतियों से सदैव बचना चाहिये-

काम सुखों में अधिक लिप्त होना तथा शरीर से कठोर साधना करना ।

उन्हें छोड़ कर जो मध्यम मार्ग मैंने खोजा है, उसका सेवन करना चाहिये ।

       यही उपदेश इनका ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ के रूप में पहला उपदेश था । अपने पाँच अनुयाइयों के साथ वे वाराणसी पहुँचे । यहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठि पुत्र को अपना अनुयायी बनाया तथा पूर्णरुप से ‘धर्म प्रवर्त्तन’ में जुट गये । अब तक उत्तर भारत में इनका काफ़ी नाम हो गया था और अनेक अनुयायी बन गये थे । कई वर्षों बाद महाराज शुद्धोदन ने इन्हें देखने के लिये कपिलवस्तु बुलवाना चाहा, लेकिन जो भी इन्हें बुलाने आता वह स्वयं इनके उपदेश सुन कर इनका अनुयायी बन जाता था । इनके शिष्य घूम-घूम कर इनका प्रचार करते थे ।
       मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का प्रहाण अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता । सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है । अत: सत्य की खोज दु:खमोक्ष के लिए परमावश्यक है । खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है । यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं । अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से उसकी खोज की । बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा । उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कही है । उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो । जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो । यही कारण था कि उनका धर्म रहस्याडम्बरों से मुक्त, मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत एवं हृदय को सीधे स्पर्श करता था ।
       भगवान बुद्ध प्रज्ञा व करुणा की मूर्ति थे । ये दोनों गुण उनमें उत्कर्ष की पराकाष्ठा प्राप्त कर समरस होकर स्थित थे । इतना ही नहीं, भगवान बुद्ध अत्यन्त उपायकुशल भी थे । उपाय कौशल बुद्ध का एक विशिष्ट गुण है अर्थात वे विविध प्रकार के विनेय जनों को विविध उपायों से सन्मार्ग पर आरूढ़ करने में अत्यन्त प्रवीण थे । वे यह भलीभाँति जानते थे कि किसे किस उपाय से सन्मार्ग पर आरूढ़ किया जा सकता है । फलत: वे विनेय जनों के विचार, रूचि, अध्याशय, स्वभाव, क्षमता और परिस्थिति के अनुरूप उपदेश दिया करते थे । भगवान बुद्ध की दूसरी विशेषता यह है कि वे सन्मार्ग के उपदेश द्वारा ही अपने जगत्कल्याण के कार्य का सम्पादन करते हैं, न कि वरदान या ऋद्धि के बल से, जैसे कि शिव या विष्णु आदि के बारे में अनेक कथाएँ पुराणों में प्रचलित हैं । उनका कहना है कि तथागत तो मात्र उपदेष्टा हैं, कृत्यसम्पादन तो स्वयं साधक व्यक्ति को ही करना है । वे जिसका कल्याण करना चाहते हैं, उसे धर्मों (पदार्थों) की यथार्थता का उपदेश देते थे । भगवान बुद्ध ने भिन्न-भिन्न समय और भिन्न-भिन्न स्थानों में विनेय जनों को अनन्त उपदेश दिये थे । सबके विषय, प्रयोजन और पात्र भिन्न-भिन्न थे । ऐसा होने पर भी समस्त उपदेशों का अन्तिम लक्ष्य एक ही था और वह था विनेय जनों को दु:खों से मुक्ति की ओर ले जाना । मोक्ष या निर्वाण ही उनके समस्त उपदेशों का एकमात्र रस है ।
       बौद्ध धर्म का प्रचार बुद्ध के जीवन काल में ही काफ़ी हो गया था, क्योंकि उन दिनों कर्मकांड का ज़ोर काफ़ी बढ़ चुका था और पशुओं की हत्या बड़ी संख्या में हो रही थी । इन्होंने इस निरर्थक हत्या को रोकने तथा जीव मात्र पर दया करने का उपदेश दिया । प्राय: 44 वर्ष तक बिहार तथा काशी के निकटवर्त्ती प्रांतों में धर्म प्रचार करने के उपरांत अंत में कुशीनगर के निकट एक वन में शाल वृक्ष के नीचे वृद्धावस्था में इनका परिनिर्वाण अर्थात शरीरांत हुआ । मृत्यु से पूर्व उन्होंने कुशीनारा के परिव्राजक सुभच्छ को अपना अन्तिम उपदेश दिया । कुशीनगर बुद्ध के महापरिनिर्वाण का स्थान है । पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले से 51 किमी की दूरी पर स्थित है । बौद्ध ग्रंथ महावंश में कुशीनगर का नाम इसी कारण कुशावती भी कहा गया है । बौद्ध काल में यही नाम कुशीनगर या पाली में कुसीनारा हो गया । एक अन्य बौद्ध किंवदंती के अनुसार तक्षशिला के इक्ष्वाकु वंशी राजा तालेश्वर का पुत्र तक्षशिला से अपनी राजधानी हटाकर कुशीनगर ले आया था । उसकी वंश परम्परा में बारहवें राजा सुदिन्न के समय तक यहाँ राजधानी रही । इनके बीच में कुश और महादर्शन नामक दो प्रतापी राजा हुए जिनका उल्लेख गौतम बुद्ध ने किया था । भगवान बुद्ध ने जो अंतिम शब्द अपने मुख से कहे थे, वे इस प्रकार थे-

“हे भिक्षुओं, इस समय आज तुमसे इतना ही कहता हूँ कि जितने भी संस्कार हैं, सब नाश होने वाले हैं, प्रमाद रहित हो कर अपना कल्याण करो ।”

       जब वे अस्सी वर्ष के थे । तब कुशी नगर में 483 ई.पू. में उन्होंने देहोत्सर्ग (महापरिनिर्वाण) किया ।

बुद्ध का उल्लेख इन लेखों में भी है :- बिम्बिसार, बोधगया, मधुवन, पिपरावा एवं पाटलिपुत्र ।
भगवान बुद्ध के अन्य नाम :- विनायक, सुगत, धर्मराज, तथागत, समन्तभद्र, मारजित्, भगवत्, मुनि, लोकजित्, जिन, षडभिज्ञ, दशबल, अद्वयवादिन्, सर्वज्ञ, श्रीघन, शास्तृ, मुनीन्द्र ।

       एक बार विश्व के विभिन्न धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन करने के लिए एक युवा ब्रह्मचारी संसार भ्रमण पर निकला । देश-विदेश का भ्रमण कर और वहां के ग्रंथों का अध्ययन कर जब वह अपने देश लौटा, तो सबके पास इस बात की शेखी बघारने लगा कि उसके समान अधिक ज्ञानी-विद्वान् संसार में और कोई नहीं । जो कोई भी उस व्यक्ति के पास जाता, वह उससे प्रश्न किया करता कि क्या उसने, उससे बढ़कर कोई विद्वान् देखा है?

यह बात भगवान् बुद्ध के कानों में भी जा पहुंची । भगवान् बुद्ध ब्राह्मण-वेश में उस व्यक्ति के पास गये । ब्रह्मचारी ने उनसे प्रश्न किया, ”तुम कौन हो, ब्राह्मण?”
”अपनी देह और मन पर जिसका पूर्ण अधिकार है, मैं ऐसा एक तुच्छ मनुष्य हूं ।” बुद्धदेव ने जवाब दिया ।
”भलीभांति स्पष्ट करो, ब्राह्मण! मेरे तो कुछ भी समझ में न आया ।” वह अहंकारी बोला ।
बुद्धदेव बोले, ”जिस तरह कुम्हार घड़े बनाता है, नाविक नौकाएं चलाता है, धनुर्धारी बाण चलाता है, गायक गीत गाता है, वादक वाद्य बजाता है और विद्वान् वाद-विवाद में भाग लेता है, उसी तरह ज्ञानी पुरुष स्वयं पर ही शासन करता है ।”
”ज्ञानी पुरुष भला स्वयं पर कैसे शासन करता है?” – ब्रह्मचारी ने पुन: प्रश्न किया ।
”लोगों द्वारा स्तुति-सुमनों की वर्षा किये जाने पर अथवा निंदा के अंगार बरसाने पर भी ज्ञानी पुरुष का मन शांत ही रहता है । उसका मन सदाचार, दया और विश्व-प्रेम पर ही केन्द्रित रहता है, अत: प्रशंसा या निंदा का उस पर कोई असर नहीं पड़ता । यहीं वजह है कि उसके चित्तसागर में शांति की धारा बहती रहती है ।”
उस ब्रह्मचारी ने जब स्वयं के बारे में सोचा, तो उसे आत्मग्लानि हुई और बुद्धदेव के चरणों पर गिरकर बोला, ”स्वामी, अब तक मैं भूल में था । मैं स्वयं को ही ज्ञानी समझता था, किंतु आज मैंने जाना कि मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना है ।”
”हां, ज्ञान का प्रथम पाठ आज ही तुम्हारी समझ में आया है, बंधु! और वह है नम्रता । तुम मेरे साथ आश्रम में चलो और इसके आगे के पाठों का अध्ययन वहीं करना ।”

(संदर्भ- प्रेरक प्रसंग, लेखक- शरद चन्द्र पेंढारकर)

बौद्ध धर्म

       बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे । वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे । उनके गुज़रने के अगले पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला, और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया । आज, बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं: थेरवाद, महायानऔर वज्रयान । बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है ।
      ”बुद्ध” वे कहलाते हैं, जिन्होने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का सत्य भाव पहचाना हो । इस पहचान को बोधि नाम दिया गया है । जो भी “अज्ञानता की नींद” से जागते हैं, वे “बुद्ध” कहलाते हैं । कहा जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध हैं – उनके पहले बहुत सारे थे और भविष्य में और होंगे । उनका कहना था कि कोई भी बुद्ध बन सकता है अगर वह उनके “धर्म” के अनुसार एक धार्मिक जीवन जीए और अपनी बुद्धि को शुद्ध करे । बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य है इस दुःख भरी स्थिति का अंत । “मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूँ – दुःख और दुःख निरोध” (बुद्ध) । बौद्ध धर्म के अनुयायी आर्य अष्टांग मार्ग के अनुसार जीकर अज्ञानता और दुःख से मुक्ति और निर्वाण पाने की कोशिश करते हैं ।

सिद्धांत

     गौतम बुद्ध के गुज़रने के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परंतु इन सब के कुछ सिद्धांत मिलते हैं ।

     प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है । प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक (कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र । क्योंकि सब कुछ अनित्य और अनात्मं (बिना आत्मा के) होता है, कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है । हर घटना मूलतः शुन्य होती है । परंतु, मानव, जिनके पास ज्ञान की शक्ति है, तृष्णा को, जो दुःख का कारण है, त्यागकर, तृष्णा में नष्ट की हुई शक्ति को ज्ञान और ध्यान में बदलकर, निर्वाण पा सकते हैं ।

चार सत्य

१. दुःख : इस दुनिया में सब कुछ दुःख है । जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुःख है ।
२. दुःख प्रारंभ : तृष्णा, या चाहत, दुःख का कारण है और फ़िर से सशरीर करके संसार को जारी रखती है ।
३. दुःख निरोध : तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है ।
४. दुःख निरोध का मार्ग : तृष्णा से मुक्ति आर्य अष्टांग मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है ।

       बुद्ध का पहिले धर्मोपदेश, जो उन्होने अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, इन चार सत्यों के बारे में था ।

अष्टांग मार्ग

       बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे स्त्य का आर्य अष्टाण्ग मार्ग है दुःख निरोध पाने का रास्ता । गौतम बुद्ध कहते थे कि चार सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए – 
    १. सम्यक दृष्टि : चार सत्य में विश्वास करना ।
    २. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना । 
    ३. सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूट न बोलना ।
    ४. सम्यक कर्म : हानिकारक कर्में न करना ।
    ५. सम्यक जीविका : कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना ।
    ६. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधारने की कोशिश करना ।
    ७. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना ।
    ८. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और स्वयं का गायब होना ।

       कुछ लोग अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है । और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है । मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शीला, और समाधि ।

बोधि

       गौतम बुद्ध से पाई गई ज्ञानता को बोधि कहलाते है । माना जाता है कि बोधि पाने के बाद ही संसार से छुटकारा पाया जा सकता है । सारी पारमिताओं (पूर्णताओं) की निष्पत्ति, चार सत्यों की पूरी समझ, और कर्म के निरोध से ही बोधि पाई जा सकती है । इस समय, लोभ, दोष, मोह, अविद्या, तृष्णा, और आत्मां में विश्वास सब गायब हो जाते है । बोधि के तीन स्तर होते है : श्रावकबोधि, प्रत्येकबोधि, और सम्यकसंबोधि । सम्यकसंबोधि बौध धर्म की सबसे उन्नत आदर्श मानी जाती है ।

दर्शन

क्षणिकवाद :- इस दुनिया में सब कुछ क्षणिक है और नश्वर है । कुछ भी स्थायी नहीं । परन्तु वेदिक मत से विरोध है ।

अनात्मवाद :- आत्मा नाम की कोई स्थायी चीज़ नहीं । जिसे लोग आत्मा समझते हैं, वो चेतना का अविच्छिन्न प्रवाह है ।

अनीश्वरवाद :- बुद्ध ईश्वर की सत्ता नहीं मानते क्योंकि दुनिया प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम पर चलती है । पर अन्य जगह बुद्ध ने सर्वोच्च सत्य को अवर्णनीय कहा है । कुछ देवताओं की सत्ता मानी गयी है, पर वो ज़्यादा शक्तिशाली नहीं हैं ।

शून्यतावाद :- शून्यता महायान बौद्ध संप्रदाय का प्रधान दर्शन है ।

साम्प्रदाय :- बौद्ध धर्म में दो मुख्य साम्प्रदाय हैं –
थेरवाद – थेरवाद या हीनयान बुद्ध के मौलिक उपदेश ही मानता है ।
महायान – महायान बुद्ध की पूजा करता है । ये थेरावादियों को “हीनयान” (छोटी गाड़ी) कहते हैं ।

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